राजा जगतपाल |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
पंवार/परमार राजवंश के इतिहास में राजा जगतपाल का विशेष महत्व उनके शासनकाल से संबंधित अभिलेखीय प्रमाण के कारण है। उन्हें परमार वंश का 34वाँ शासक माना जाता है। जगतपाल के संबंध में प्रमुख जानकारी देवप्रयाग स्थित रघुनाथ मंदिर के ताम्रपत्र अभिलेख से प्राप्त होती है। यह ताम्रपत्र न केवल उनके राजनीतिक प्रभुत्व पर प्रकाश डालता है, बल्कि उनके धार्मिक एवं दान संबंधी कार्यों की भी जानकारी देता है। विशेष रूप से वैष्णव मंदिरों को भूमि दान का उल्लेख परमार वंश के धार्मिक संरक्षण और भूमि-दान परंपरा के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
प्रमुख बिंदु
- राजा जगतपाल को पंवार/परमार राजवंश का 34वाँ राजा माना जाता है।
- जगतपाल के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख से मिलती है।
- इस ताम्रपत्र अभिलेख में जगतपाल को ‘रजबार’ तथा प्रभुत्व-संपन्न शासक के रूप में वर्णित किया गया है।
- अभिलेख से ज्ञात होता है कि राजा जगतपाल ने अनेक वैष्णव मंदिरों को भूमि दान प्रदान किया था।
- वैष्णव मंदिरों को भूमि दान का यह उल्लेख परमार वंश में भूमि-दान का प्रथम साक्ष्य माना जाता है।
- जगतपाल से संबंधित इस ताम्रपत्र को 1455 ई. में उत्कीर्ण किया गया था।
निष्कर्ष
राजा जगतपाल पंवार/परमार राजवंश के 34वें शासक के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके शासन के संबंध में उपलब्ध प्रमुख प्रमाण देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर का ताम्रपत्र अभिलेख है, जिसकी उत्कीर्णन तिथि 1455 ई. बताई जाती है। इस अभिलेख में उन्हें प्रभुत्व-संपन्न ‘रजबार’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा अनेक वैष्णव मंदिरों को भूमि दान देने का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाण परमार शासकों की धार्मिक नीति और मंदिरों के प्रति संरक्षण की भावना को समझने में महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से इसे परमार वंश में भूमि-दान का प्रथम साक्ष्य माना जाता है। अतः जगतपाल का शासनकाल अभिलेखीय एवं धार्मिक इतिहास की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।