चंदकालीन शासन व्यवस्था एवं प्रशासन
परिचय
चंदवंश ने कुमाऊँ में लंबे समय तक शासन किया और इस दौरान एक विकसित प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण किया। चंद प्रशासन पर पूर्ववर्ती कत्यूरी प्रशासन, मुगल प्रशासन तथा पड़ोसी डोटी (नेपाल) की प्रशासनिक परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। चंद शासकों ने अपने शासन को व्यवस्थित करने के लिए राजा, युवराज, मंत्री एवं विभिन्न अधिकारियों की व्यवस्था की थी। प्रशासन में महरा और फर्त्याल जैसे प्रभावशाली वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भूमि, न्याय, सेना, राजस्व तथा शासनादेशों से संबंधित प्रमुख अधिकार राजा के हाथों में केंद्रित थे।
चंदकालीन शासन व्यवस्था एवं प्रशासन विशेषताये
- चंद प्रशासन की पृष्ठभूमि — चंदवंश के हाथ में सत्ता कत्यूरी वंश से आई थी, इसलिए चंद प्रशासन पर कत्यूरी प्रशासन का प्रभाव स्वाभाविक रूप से पड़ा। इसके अतिरिक्त चंदों का मुगल दरबार से निरंतर संपर्क रहा तथा डोटी (नेपाल) से भी उनके संबंध थे। इस कारण चंद प्रशासन में कत्यूरी, मुगल एवं डोटी प्रशासनिक परंपराओं का मिश्रित प्रभाव दिखाई देता है।
- शासकीय उपाधियाँ — चंद नरेशों ने अपने समय में प्रचलित विभिन्न उपाधियाँ धारण कीं। राजकुमारों के नाम के साथ “महाराज कुमार”, “कुँवर” तथा “गुसाईं” जैसे विरुदों का प्रयोग मिलता है। चंद शासकों ने “श्रीराजाधिराज” तथा “राजाधिराज महाराजा” जैसी उपाधियाँ भी ग्रहण कीं।
- शासनादेश एवं भाषा — चंद शासकों द्वारा अधिकांश शासनादेश नेपाली मिश्रित कुमाऊँनी भाषा में जारी किए जाते थे। इससे तत्कालीन क्षेत्र में कुमाऊँनी भाषा के प्रचलन का संकेत मिलता है।
- ताम्रपत्रों की विशेषता — चंदों के ताम्रपत्रों पर ‘कृष्ण’ शब्द के बाद ‘सही’ तथा कटार की मूठ का चित्र उत्कीर्ण रहता था। सम्भवतः कटार की मूठ चंद वंश का राजकीय चिन्ह थी, जिसका प्रयोग ताम्रपत्रों की वैधता के लिए किया जाता था।
- ताम्रपत्रों के लेखक एवं उत्कीर्णक — ताम्रपत्रों के लेखक ‘जोईसी’ होते थे। उत्कीर्णकों को ‘सुदार’ अथवा ‘सुनार’ कहा जाता था। भारतीचंद के खेतीखान ताम्रपत्र में लेखक को ‘विप्र पुरोहित’, जबकि एक अन्य ताम्रपत्र में ‘जैतूसाहू’ कहा गया है। ज्ञानचंद के गोबसा ताम्रपत्र में उत्कीर्णक के लिए ‘इंद पधाकरेण’ संज्ञा का प्रयोग हुआ है।
- राजा की स्थिति — राजा सम्पूर्ण प्रशासन की धुरी था। वह राज्य का प्रधान न्यायाधीश भी होता था तथा राज्य की संपूर्ण भूमि उसके अधीन मानी जाती थी।
- भूमिदान का अधिकार — गूंठ, संकल्प या रौत के रूप में भूमि-दान करने का अधिकार राजा अथवा युवराज को था। चंद शासकों द्वारा ‘देव’ विरुद धारण करने से यह संकेत मिलता है कि राजा को पृथ्वी पर देव-प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता था।
- राजा के सामान्य कार्य — सामान्य समय में राजा राजदरबार में बैठकर प्रजा से संबंधित कार्यों एवं मामलों पर निर्णय लेता था। इन कार्यों में उसे सभासदों की सहायता मिलती थी।
- युद्ध में राजा की भूमिका — युद्ध के समय चंद राजा स्वयं सेना का नेतृत्व करते थे। इस प्रकार राजा प्रशासनिक एवं सैन्य दोनों व्यवस्थाओं का सर्वोच्च अधिकारी था।
- युवराज पद — राजा को राजकार्यों में सहायता देने के लिए युवराज पद की व्यवस्था थी। सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र को युवराज बनाया जाता था। युवराज के नाम के साथ ‘कुँवर’ या ‘गुसाईं’ जैसे विरुदों का प्रयोग होता था।
- युवराज के अधिकार एवं दायित्व — राजा के वृद्ध या निशक्त होने की स्थिति में युवराज का दायित्व बढ़ जाता था। राजा द्वारा दिए गए भूमिदान (रौत) में युवराज प्रथम गवाह माना जाता था। कभी-कभी युवराज स्वयं भी भूमिदान करता था। पर्वतचंद, रतनचंद एवं त्रिमलचंद इसके उदाहरण हैं।
- युवराज की सैन्य भूमिका — राजा के बाद युवराज ही सेना का सर्वोच्च सेनापति होता था। लक्ष्मीचंद के काल में कुंवर त्रिमलचंद ने गढ़राज्य विजय की थी।
- युवराज-मंत्री — चंद प्रशासन में एक विशेष व्यवस्था ‘युवराज-मंत्री’ की थी। इनका उद्देश्य युवराज को राजकार्य में सहायता देना था। सामान्यतः ये ब्राह्मण होते थे और चंद दरबार के राजनीतिक षड्यंत्रों एवं अशांति में भी उनकी भूमिका बताई गई है।
- मंत्री एवं परामर्शदाता — राजा की सहायता के लिए परामर्शदाताओं का एक समूह होता था। इनमें अधिकांश समय महरा एवं फर्त्याल जाति के लोगों का प्रभाव रहा। हालांकि राजा उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था।
- महरा एवं फर्त्यालों की भूमिका — महरा और फर्त्याल चंद प्रशासन के दो प्रमुख स्तम्भ माने जाते थे। दरबार में जिस समय महरा अथवा फर्त्याल गुट का बहुमत होता था, उसी गुट के लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ मिलती थीं।
- अन्य परामर्शदाता — महरा एवं फर्त्यालों के अतिरिक्त ब्राह्मण तथा अब्राह्मण वर्ग के लोग भी परामर्शदाता होते थे। इनमें ढेक, टम्बा, नाई आदि शामिल थे। गुरु, पुरोहित, वैद्य, लेखक, ताम्रकट्टक तथा उत्कीर्णक को भी दरबार में स्थान प्राप्त था।
- दीवान का पद — दीवान का पद सभी परामर्शदाताओं में श्रेष्ठ अथवा प्रधान माना जाता था। यह पद सामान्यतः जोशियों को दिया जाता था।
- बक्शी का पद — दीपचंद के सैण-मानु पट्टाभिलेख में शिवदेव को ‘बगसी’ कहा गया है। दीवान और बक्शी के पद सामान्यतः वंशानुगत होते थे।
- छोटे मंत्री एवं सचिव — दीवान के अतिरिक्त छोटे-छोटे मंत्री अथवा सचिव होते थे, जिनकी अधिकतम संख्या लगभग 10 होती थी। इन्हें वेतन के बदले भूमि प्रदान की जाती थी।
- विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी — पुरोहित, गुरु (ज्योतिष), बक्शी, भंडारी, प्रहरी, सेज्याली, चौधरी, सुदार तथा बिष्ट आदि सचिव अथवा छोटे मंत्री के रूप में प्रशासन के अलग-अलग दायित्वों का निर्वहन करते थे।
- अन्य कर्मचारी — ताम्रपत्र तैयार करने वाले टम्टा (तमोटा) तथा राजा की भूमि जोतने वाले हलवाले भी सम्भवतः इसी प्रशासनिक श्रेणी से संबंधित थे।
निष्कर्ष
चंदकालीन प्रशासन एक राजा-केंद्रित एवं बहुस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था थी, जिसमें राजा सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था। न्याय, भूमि, सैन्य व्यवस्था तथा महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों में उसकी प्रमुख भूमिका थी। राजा की सहायता के लिए युवराज, युवराज-मंत्री, दीवान, बक्शी, मंत्री, सचिव तथा विभिन्न अधिकारी कार्य करते थे। महरा और फर्त्याल जैसे प्रभावशाली वर्गों ने चंद प्रशासन में विशेष स्थान बनाया। प्रशासनिक शब्दावली और संस्थाओं में कत्यूरी, मुगल तथा डोटी परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। ताम्रपत्रों की परंपरा, भूमिदान व्यवस्था और विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति से स्पष्ट होता है कि चंदों ने कुमाऊँ में एक संगठित एवं प्रभावी शासन व्यवस्था विकसित की थी।