चंद शासनकाल में प्रचलित कर
परिचय
चंद राजाओं के शासनकाल में भूमि-कर के अतिरिक्त अनेक प्रकार के कर, शुल्क और दस्तूर प्रजा से वसूले जाते थे। इन करों का संबंध केवल कृषि से नहीं था, बल्कि व्यापार, पशुपालन, जंगल, खनन, वस्त्र-निर्माण, कुली-बेगार, धार्मिक अनुष्ठानों, सेना तथा राजकीय सेवाओं से भी था। ताम्रपत्रों, विशेषकर मूनाकोट एवं सिंगाली ताम्रपत्रों, से इन करों की जानकारी मिलती है। करों का भुगतान नकद, अनाज, वस्तु अथवा श्रम के रूप में किया जाता था। इनसे चंद शासकों की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था की विविधता का पता चलता है।
चंद शासनकाल के प्रमुख कर
- ज्यूलिया — नदी के पुलों पर लगाया जाने वाला कर। इसे सांगा भी कहा जाता था।
- सिरती — नकद कर, जो प्रायः माल-भाबर एवं भोटिया व्यापारियों से वसूला जाता था। इसी से ‘सिरतान’ शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है।
- बैकर — अनाज के रूप में लिया जाने वाला कर।
- रखिया (रछया) — सावन के महीने में रक्षाबंधन एवं जनेऊ-संस्कार के समय वसूला जाने वाला कर।
- कूत — नकद के स्थान पर अनाज के रूप में दिया जाने वाला कर।
- भेंट — राजा एवं राजकुमारों को दी जाने वाली भेंट।
- मांगा — युद्ध के समय लिया जाने वाला कर।
- साहू (साउलि) — लेखक को देय कर।
- रंतगली — लेखक को देय कर। इसका उल्लेख मूनाकोट ताम्रपत्र में मिलता है।
- खेनी-कपीलनी — कुली-बेगार से संबंधित कर/दायित्व।
- कटक — सेना के लिए लिया जाने वाला कर।
- स्यूक — राजकीय सेवकों के लिए लिया जाने वाला कर।
- कमीनचारी-सयानचारी — किसानों से लगान वसूल करने वालों तथा सयानों को देय कर।
- सीकदार नेगी — परगनाधिकारी को देय कर। लक्ष्मण चंद (लछिमन चंद) के मूनाकोट ताम्रपत्र में इसके लिए दो रुपये कर निर्धारित होने का उल्लेख है। यह कर पूरे गाँव से लिया जाता था।
- गर्खा नेगी — गर्खाधिकारी को देय कर। इसका उल्लेख भी मूनाकोट ताम्रपत्र में मिलता है।
- कनक — मूनाकोट ताम्रपत्र में उल्लिखित कर, जो शौका व्यापारियों से स्वर्ण-धूल के रूप में लिया जाता था।
- हिलयानि-अधूल — इसका उल्लेख सिंगाली ताम्रपत्र में मिलता है। बरसात के समय सड़कों की मरम्मत के लिए लिया जाता था।18. ज्यूलिया — नदी के पुलों पर लगाया जाने वाला कर। इसे सांगा भी कहा जाता था।
- सिरती — नकद कर, जो प्रायः माल-भाबर एवं भोटिया व्यापारियों से वसूला जाता था। इसी से ‘सिरतान’ शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है।
- बैकर — अनाज के रूप में लिया जाने वाला कर।
- रखिया (रछया) — सावन के महीने में रक्षाबंधन एवं जनेऊ-संस्कार के समय वसूला जाने वाला कर।
- कूत — नकद के स्थान पर अनाज के रूप में दिया जाने वाला कर।
- भेंट — राजा एवं राजकुमारों को दी जाने वाली भेंट।
- मांगा — युद्ध के समय लिया जाने वाला कर।
- साहू (साउलि) — लेखक को देय कर।
- रंतगली — लेखक को देय कर। इसका उल्लेख मूनाकोट ताम्रपत्र में मिलता है।
- खेनी-कपीलनी — कुली-बेगार से संबंधित कर/दायित्व।
- कटक — सेना के लिए लिया जाने वाला कर।
- स्यूक — राजकीय सेवकों के लिए लिया जाने वाला कर।
- कमीनचारी-सयानचारी — किसानों से लगान वसूल करने वालों तथा सयानों को देय कर।
- सीकदार नेगी — परगनाधिकारी को देय कर। लक्ष्मण चंद (लछिमन चंद) के मूनाकोट ताम्रपत्र में इसके लिए दो रुपये कर निर्धारित होने का उल्लेख है। यह कर पूरे गाँव से लिया जाता था।
- गर्खा नेगी — गर्खाधिकारी को देय कर। इसका उल्लेख भी मूनाकोट ताम्रपत्र में मिलता है।
- कनक — मूनाकोट ताम्रपत्र में उल्लिखित कर, जो शौका व्यापारियों से स्वर्ण-धूल के रूप में लिया जाता था।
- हिलयानि-अधूल — इसका उल्लेख सिंगाली ताम्रपत्र में मिलता है। बरसात के समय सड़कों की मरम्मत के लिए लिया जाता था।
- डाला — गाँव के सयानों को अनाज के रूप में दिया जाने वाला दस्तूर।
- मिझारी — कामगारों से लिया जाने वाला कर। बाद में गोरखों द्वारा भी इसे लिया गया।
- तान या टांड़ — सूती एवं ऊनी वस्त्रों के बुनकरों से लिया जाने वाला कर।
- घी कर — घी बेचने वालों से लिया जाने वाला कर।
- मौ कर — प्रत्येक परिवार पर लगाया जाने वाला कर।
- भात-कर — बड़े उत्सवों में भात की दावत पर लगाया जाने वाला कर।
- गाय चराई — तराई-भावर क्षेत्र में गाय चराने वालों से लिया जाने वाला कर।
- भैंस कर — ट्रेल के अनुसार प्रत्येक भैंस पर चार आना वार्षिक की दर से लिया जा सकता था।
- व्यापार कर — बुनकरों से लिया जाने वाला कर। नमक एवं कस्तूरी पर भी व्यापार कर लगाया जाता था।
- खानों पर कर — खनन कार्य करने वालों, विशेषकर आगरी समुदाय द्वारा तांबा निकालने से संबंधित कर।
- जंगलात कर — जंगलों का उपयोग करने वालों से लिया जाने वाला कर।
- न्यौवाली कर — न्याय प्राप्त करने के लिए दिया जाने वाला कर।
- जगरिया — जागर लगाने वाले पुजारी ब्राह्मणों से लिया जाने वाला कर।
- रोल्या-देवल्या — राजपरिवार के देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर लिया जाने वाला कर। बलि अथवा भोजन के लिए बकरे भी लिए जाते थे।
- भाग — घराटों पर लगाया जाने वाला कर।
- अन्य करों का उल्लेख
- चंद राजाओं के ताम्रपत्रों में उपर्युक्त करों के अतिरिक्त निम्न करों का भी उल्लेख मिलता है—
- पहरी या पौरी — राजधानी एवं प्रमुख गाँवों की रखवाली करने वालों को देय कर।
- बखरिया — राजा के सईस के लिए देय कर। मूनाकोट ताम्रपत्र में दो रुपये कर देने का उल्लेख मिलता है। यह प्रत्येक गाँव से लिया जाता था।
- घोड़ियालों — राजा के घोड़ों के लिए देय कर।
- कुकुरयालों — राजा के कुत्तों के लिए देय कर।
- बाजदार — महाजन को देय कर।
- बजनिया — राजा के नर्तकों एवं नर्तकियों के लिए लिया जाने वाला कर। नगाड़े एवं दुंदुभी बजाने वालों से संबंधित कर भी इसी श्रेणी में था।
- चोपदार — राजा की व्यक्तिगत वस्तुओं, जैसे तलवार-ढाल आदि को ढोने वालों के लिए लिया जाने वाला कर।
- इनके अतिरिक्त महर, ओड़, नेलिया तथा तपनीय नामक करों का भी उल्लेख मिलता है।
- डाला — गाँव के सयानों को अनाज के रूप में दिया जाने वाला दस्तूर।
- मिझारी — कामगारों से लिया जाने वाला कर। बाद में गोरखों द्वारा भी इसे लिया गया।
- तान या टांड़ — सूती एवं ऊनी वस्त्रों के बुनकरों से लिया जाने वाला कर।
- घी कर — घी बेचने वालों से लिया जाने वाला कर।
- मौ कर — प्रत्येक परिवार पर लगाया जाने वाला कर।
- भात-कर — बड़े उत्सवों में भात की दावत पर लगाया जाने वाला कर।
- गाय चराई — तराई-भावर क्षेत्र में गाय चराने वालों से लिया जाने वाला कर।
- भैंस कर — ट्रेल के अनुसार प्रत्येक भैंस पर चार आना वार्षिक की दर से लिया जा सकता था।
- व्यापार कर — बुनकरों से लिया जाने वाला कर। नमक एवं कस्तूरी पर भी व्यापार कर लगाया जाता था।
- खानों पर कर — खनन कार्य करने वालों, विशेषकर आगरी समुदाय द्वारा तांबा निकालने से संबंधित कर।
- जंगलात कर — जंगलों का उपयोग करने वालों से लिया जाने वाला कर।
- न्यौवाली कर — न्याय प्राप्त करने के लिए दिया जाने वाला कर।
- जगरिया — जागर लगाने वाले पुजारी ब्राह्मणों से लिया जाने वाला कर।
- रोल्या-देवल्या — राजपरिवार के देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर लिया जाने वाला कर। बलि अथवा भोजन के लिए बकरे भी लिए जाते थे।
- भाग — घराटों पर लगाया जाने वाला कर।
अन्य करों का उल्लेखचंद राजाओं के ताम्रपत्रों में उपर्युक्त करों के अतिरिक्त निम्न करों का भी उल्लेख मिलता है—
- पहरी या पौरी — राजधानी एवं प्रमुख गाँवों की रखवाली करने वालों को देय कर।
- बखरिया — राजा के सईस के लिए देय कर। मूनाकोट ताम्रपत्र में दो रुपये कर देने का उल्लेख मिलता है। यह प्रत्येक गाँव से लिया जाता था।
- घोड़ियालों — राजा के घोड़ों के लिए देय कर।
- कुकुरयालों — राजा के कुत्तों के लिए देय कर।
- बाजदार — महाजन को देय कर।
- बजनिया — राजा के नर्तकों एवं नर्तकियों के लिए लिया जाने वाला कर। नगाड़े एवं दुंदुभी बजाने वालों से संबंधित कर भी इसी श्रेणी में था।
- चोपदार — राजा की व्यक्तिगत वस्तुओं, जैसे तलवार-ढाल आदि को ढोने वालों के लिए लिया जाने वाला कर।
- इनके अतिरिक्त महर, ओड़, नेलिया तथा तपनीय नामक करों का भी उल्लेख मिलता है।
निष्कर्ष
चंदकालीन राजस्व व्यवस्था में भूमि-कर के साथ अनेक विशिष्ट करों का प्रचलन था। इनका आधार कृषि, व्यापार, पशुपालन, खनन, वन-उपयोग, वस्त्र-निर्माण, परिवहन, सैन्य आवश्यकताओं तथा राजकीय एवं धार्मिक सेवाओं तक विस्तृत था। मूनाकोट और सिंगाली ताम्रपत्र इस कर-व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। करों की विविधता से स्पष्ट होता है कि चंद शासन में राजस्व-संग्रह केवल भूमि से प्राप्त आय तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों और राजकीय आवश्यकताओं को भी कर-व्यवस्था में शामिल किया गया था।