रुद्रचंद भाग -3

  • गाँवों से अनाज का छठा भाग राजधानी तक पहुँचाने के लिए कैनी-खसों का कार्य निर्धारित किया गया।
  • घरों में सेवा कार्य के लिए छयोड़ (पुरुष दास) और छयोड़ियाँ (महिला दास) रखने की व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।
  • सामान्य जनता के लिए ‘पौड़ी पन्द्रह विस्वा’ नाम का उल्लेख मिलता है।
  • नाई, कुम्हार, दर्जी, लोहार आदि शिल्पियों के लिए भी अनाज के रूप में दस्तूर निर्धारित किए गए।
  • रुद्रचंद द्वारा ‘बुखुडिया’ नामक नया कर शुरू किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • रुद्रचंद की संस्कृत-प्रेमी विद्वत्ता तथा तलवार चलाने में दक्षता के कारण उन्हें ‘कुर्मांचल का हर्ष शिलादित्य’ भी कहा गया।
  • रुद्रचंद अकबर के समकालीन थे और उनके समय में चंद राज्य के मुगल सत्ता के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित हुए।
  • अबुल फजल की ‘आइने-अकबरी’ में कुमाऊँ को दिल्ली सूबे की सरकार के अंतर्गत दर्शाया गया है।

निष्कर्ष

राजा रुद्रचंद चंद वंश के इतिहास में सैन्य शक्ति, क्षेत्रीय विस्तार, प्रशासनिक सुधार और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने सीरा पर विजय प्राप्त कर अपने पिता बालो कल्याण चंद की अधूरी इच्छा पूरी की तथा अस्कोट, दारमा और जोहार तक चंद प्रभाव का विस्तार किया। तराई-भावर पर अधिकार और रुद्रपुर की स्थापना उनकी प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षमता को दर्शाती है। मुगल सम्राट अकबर के समकालीन होने के कारण उनके शासन में चंद-मुगल संबंधों का नया अध्याय प्रारंभ हुआ और चौरासी माल की जागीर प्राप्त हुई। दूसरी ओर, गढ़वाल के साथ संघर्ष में उनके सेनापति पुरुष पंत की मृत्यु एक बड़ी क्षति थी। रुद्रचंद केवल विजेता ही नहीं, बल्कि संस्कृत के महान संरक्षक, विद्वानों के आश्रयदाता और प्रशासनिक सुधारक भी थे। भूमि की पैमाइश, भू-कर निर्धारण, सामाजिक वर्गीकरण तथा विभिन्न राजकीय पदों की व्यवस्था उनके संगठित शासन को दर्शाती है। इसलिए उन्हें चंद वंश के सबसे योग्य एवं बहुआयामी शासकों में गिना जाता है।

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