राजा रुद्रचंद भाग -2
- सीरा विजय की स्मृति में रुद्रचंद ने थल में शिव मंदिर की स्थापना कराई।
- सीरा (डीडीहाट) से प्राप्त भूमि दस्तावेजों में रुद्रचंद की विजय तथा उनके द्वारा भूमि के व्यवस्थित बंदोबस्त का उल्लेख मिलता है।
- रुद्रचंद ने पुरुष पंत की सहायता से अस्कोट, दारमा और जोहार क्षेत्रों पर भी अपना प्रभाव स्थापित किया।
- सीरा विजय के बाद अस्कोट, दारमा और जोहार रुद्रचंद के अधीन आ गए, जबकि व्यास-चौदास की घाटियाँ जुमला राज्य के अधीन बनी रहीं।
- रुद्रचंद के समय बधानगढ़ का युद्ध हुआ। इसकी तिथि के संबंध में मतभेद है—वॉल्टन ने 1581 ई., जबकि शिव प्रसाद डबराल ने 1590–91 ई. माना है।
- यह युद्ध चमोली-बागेश्वर सीमा के ग्वालदम क्षेत्र में हुआ था, इसलिए इसे ग्वालदम का युद्ध भी कहा जाता है।
- बधानगढ़/ग्वालदम का युद्ध परमार राजा बलभद्रशाह और चंद राजा रुद्रचंद के बीच हुआ।
- इस युद्ध में कत्यूरी शासक सुकालदेव ने बलभद्रशाह का साथ दिया।
- युद्ध में सुकालदेव ने रुद्रचंद के वीर सेनापति पुरुष पंत की हत्या कर दी।
- पुरुष पंत की मृत्यु से दुखी रुद्रचंद ने बाद में बैजनाथ के युद्ध में सुकालदेव को पराजित कर मार दिया
- गढ़वाल के साथ संघर्ष रुद्रचंद के लिए इस दृष्टि से हानिकारक रहा कि उन्हें अपने योग्य एवं वीर सेनापति पुरुष पंत को खोना पड़ा।
- तराई में प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए रुद्रचंद ने रुद्रपुर नगर की स्थापना की।
- उन्होंने अल्मोड़ा में मल्ला महल किले का निर्माण करवाया और उसके भीतर रामशिला मंदिर बनवाया।
- रुद्रचंद स्वयं विद्वान थे तथा विद्वानों के आश्रयदाता भी थे।
- उनके समय में ‘श्येन शास्त्र’, ‘त्रैवर्णिक धर्म निर्णय’, ‘यायातिचरित्रम्’ तथा ‘उषारागोदय’ जैसे ग्रंथों की रचना हुई।
- ‘श्येन शास्त्र’ पक्षी-आखेट से संबंधित ग्रंथ था।
- रुद्रचंद ने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार को विशेष प्रोत्साहन दिया।
- उन्होंने युवाओं को राजकीय खर्च पर संस्कृत शिक्षा के लिए काशी और कश्मीर भेजा तथा अल्मोड़ा में भी संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था की।
- रुद्रचंद ने राजस्व व्यवस्था में सुधार के लिए भूमि की पैमाइश तथा भू-कर का निर्धारण करवाया।
- इस कार्य में उनके नेत्रहीन पुत्र कुँवर शक्तिसिंह ने सहायता की।
- डॉ. श्यामलाल के अनुसार, रुद्रचंद ने नई सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया और इसके लिए ‘त्रैवर्णिक धर्म-निर्णय’ की रचना करवाई।
- इस व्यवस्था में ब्राह्मणों के गोत्र एवं पारस्परिक संबंधों का निर्धारण किया गया तथा विभिन्न ब्राह्मण वर्गों की व्यवस्था की गई।
- कुमाऊँ में चौथानी, पचबिडिये/तिथानी तथा हलिये या पितलिये ब्राह्मणों के वर्गों का उल्लेख मिलता है।
- रुद्रचंद के समय गुरु, पुरोहित, वेद, पौराणिक, सईस, राजकोली, पहरी, बाजदार, बजनिया तथा टम्टा आदि विभिन्न पद निर्धारित किए गए।
- टम्टा ताम्रपत्रों के निर्माण एवं उत्कीर्णन से संबंधित कार्य करते थे।
- सईस, साहू और रंतगली आदि के लिए गाँव-गाँव में अनाज अथवा अन्य रूप में दस्तूर निर्धारित किए गए।
- ओलावृष्टि के समय थाली बजाकर लोगों को सावधान करने वाले ‘ओली ब्राह्मणों’ का वर्ग बनाया गया और उनके लिए भी गाँवों से अनाज के रूप में दस्तूर निर्धारित किया गया।