राजा रुद्रचंद चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा रुद्रचंद चंद वंश के महान, शक्तिशाली, दूरदर्शी एवं बहुआयामी शासकों में प्रमुख स्थान रखते हैं। वे ऐसे शासक थे जिनके व्यक्तित्व में वीर योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ, सक्षम प्रशासक, विद्वान और साहित्य-संस्कृति के संरक्षक के गुण एक साथ दिखाई देते हैं। उनके शासनकाल में चंद राज्य की राजनीतिक शक्ति का व्यापक विस्तार हुआ। उन्होंने सीरा, अस्कोट, दारमा, जोहार तथा तराई-भावर जैसे क्षेत्रों में चंद प्रभुत्व स्थापित किया और गढ़वाल के साथ भी संघर्ष किया। मुगल सम्राट अकबर के समकालीन होने के कारण उन्होंने कूटनीति का भी प्रभावी प्रयोग किया। प्रशासन के क्षेत्र में भूमि की पैमाइश, भू-कर निर्धारण और राजस्व व्यवस्था में सुधार किए। वहीं संस्कृत के प्रति विशेष अनुराग रखते हुए उन्होंने विद्वानों को संरक्षण तथा युवाओं को काशी-कश्मीर में शिक्षा दिलाने की व्यवस्था की। इस प्रकार रुद्रचंद का शासन चंद राज्य के राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
प्रमुख बिंदु
- बालो कल्याण चंद के पश्चात् रुद्रचंद चंद राज्य के शासक बने।
- रुद्रचंद के समय की प्रमुख घटनाओं में हुसैन खाँ टुकड़िया का कुमाऊँ पर आक्रमण महत्वपूर्ण था। टुकड़िया लखनऊ का सूबेदार था और कुमाऊँ को समृद्ध राज्य मानता था।
- बदायूँनी के अनुसार, टुकड़िया का कुमाऊँ पर आक्रमण करने का एक प्रमुख उद्देश्य मंदिरों को नष्ट करना, मूर्तियों को तोड़ना तथा धन-संपत्ति लूटना था।
- टुकड़िया ने यह भी सुना था कि कुमाऊँ के मंदिरों की ईंटें सोने-चाँदी की बनी हैं और यहाँ अपार खजाना है।
- टुकड़िया ने विशाल सेना के साथ कुमाऊँ पर आक्रमण किया तथा विभिन्न स्थानों पर लूटपाट और मंदिरों का विध्वंस किया।
- कुमाऊँ के लोगों ने ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में शरण लेकर वहाँ से पत्थरों और बाणों द्वारा मुगल सेना का सामना किया।
- वर्षा के कारण टुकड़िया की सेना को वापस लौटना पड़ा। बाद में टुकड़िया को काठगोला की जागीर प्रदान की गई।
- अपनी अधूरी इच्छा के कारण टुकड़िया ने 1575 ई. में पुनः तराई-भावर और पर्वतीय क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा लूटपाट करके वापस लौट गया।
- कुछ समय बाद पुराने घाव के कारण टुकड़िया की मृत्यु हो गई। इसका लाभ उठाकर रुद्रचंद ने तराई पर अधिकार कर मुसलमानों को वहाँ से बाहर कर दिया।
- तराई पर रुद्रचंद के अधिकार की सूचना मिलने पर अकबर ने उनके विरुद्ध सेना भेजने का निर्णय किया।
- स्थिति को समझते हुए रुद्रचंद मुगल दरबार में पहुँचे और अकबर को अनेक उपहार भेंट किए।
- यह घटना 1587–88 ई. के आसपास की मानी जाती है। इसका उल्लेख जहाँगीर की ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ तथा बदायूँनी के विवरण में मिलता है।
- बदायूँनी के अनुसार, कुमाऊँ का राजा शिवालिक पर्वत से होकर लाहौर पहुँचा और अकबर से भेंट की तथा उसे तिब्बती याक, कस्तूरी, घोड़े आदि उपहार दिए।
- रुद्रचंद ने नागौर के युद्ध में अकबर का साथ दिया।
- रुद्रचंद और उनकी सेना की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें चौरासी माल (तराई-भावर) की जागीर प्रदान की।
- चौरासी माल से लगभग 9 लाख रुपये वार्षिक आय होती थी, इसलिए इसे ‘नौलखिया माल’ भी कहा गया।
- रुद्रचंद के बीरबल तथा उनके परिवार से मधुर संबंध थे। उन्होंने बीरबल के पुत्र को अपना पुरोहित बनाया।
- बीरबल के वंशज चंद वंश के पतन तक प्रतिवर्ष दक्षिणा लेने अल्मोड़ा आते रहे।
- रुद्रचंद की प्रमुख उपलब्धियों में सीरा पर विजय भी शामिल थी। सीरा उस समय डोटी के रैका हरिमल्ल के अधीन था।
- हरिमल्ल, रुद्रचंद के पिता बालो कल्याण चंद की रानी का भाई था। बालो कल्याण चंद सीरा प्राप्त करने में सफल नहीं हुए थे।
- रुद्रचंद ने अपने पिता की अधूरी इच्छा पूरी करने के लिए सीरा पर अनेक बार आक्रमण किया, लेकिन प्रारंभिक प्रयास असफल रहे।
- अंततः रुद्रचंद ने सीरा के किले की घेराबंदी कर रसद की आपूर्ति बंद कर दी, जिससे किले के सैनिक कमजोर पड़ गए।
- रुद्रचंद के सेनापति पुरुष पंत/पुरखू पंत ने किले में प्रवेश कर वहाँ चंद राज्य का झंडा फहरा दिया।
- इस प्रकार जो कार्य बालो कल्याण चंद पूरा नहीं कर सके थे, उसे रुद्रचंद ने पूरा किया।
- सीरा विजय में सेनापति पुरुष पंत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था।