राजा मानिकचंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

चंद वंश के इतिहास में राजा मानिकचंद का स्थान विशेष रूप से उनकी स्वतंत्रता-प्रियता, साहस और शरणागत-रक्षा की नीति के कारण महत्वपूर्ण है। उनके समय में कुमाऊँ का चंद राज्य बाहरी राजनीतिक शक्तियों के दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए हुए था। इसी काल की सबसे चर्चित घटना सूरवंशीय शासक इस्लाम शाह सूर के विरोधी खवास खाँ को कुमाऊँ में शरण देना थी। सूर शासक के आदेश के बावजूद मानिकचंद द्वारा खवास खाँ को सौंपने से इंकार करना तत्कालीन कुमाऊँ की राजनीतिक स्वायत्तता और चंद शासक के दृढ़ चरित्र को दर्शाता है। इस घटना का उल्लेख अब्दुल्ला की ‘तवारीख-ए-दाऊदी’ में मिलता है।

प्रमुख बिंदु

  • राजा मानिकचंद के काल की एक महत्वपूर्ण घटना खवास खाँ का कुमाऊँ में शरण लेना थी।
  • खवास खाँ ने कुमाऊँ क्षेत्र में शरण ली थी। वह दिल्ली के सूरवंशी शासक इस्लाम शाह सूर का विरोधी था।
  • खवास खाँ ने सूर शासन के विरुद्ध विद्रोह किया था, लेकिन सूर सेना ने उसके विद्रोह को दबा दिया।
  • विद्रोह असफल होने के बाद खवास खाँ भागकर कुमाऊँ में शरण लेने के लिए आया।
  • सूर शासक ने कुमाऊँ के चंद राजा को आदेश दिया कि खवास खाँ को पकड़कर दिल्ली की सेना के हवाले कर दिया जाए।
  • कुमाऊँ के चंद राजा ने शरणागत व्यक्ति को पकड़कर सौंपने से इंकार कर दिया।
  • चंद राजा का यह निर्णय शरणागत की रक्षा की परंपरा, वीरता एवं स्वतंत्र राजनीतिक दृष्टिकोण का परिचायक था।
  • तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने भी कुमाऊँ के राजा के इस साहस और व्यवहार की प्रशंसा की है।
  • चंद राजा द्वारा खवास खाँ को संरक्षण देने की यह घटना अब्दुल्ला द्वारा रचित ‘तवारीख-ए-दाऊदी’ में वर्णित है।

निष्कर्ष

राजा मानिकचंद का काल चंद वंश के इतिहास में मुख्यतः खवास खाँ को कुमाऊँ में शरण देने की घटना के कारण उल्लेखनीय है। सूर शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के बाद खवास खाँ के कुमाऊँ आने पर सूर शासक ने उसे पकड़कर दिल्ली की सेना को सौंपने का आदेश दिया, लेकिन चंद राजा ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया। शरण में आए व्यक्ति को राजनीतिक दबाव के बावजूद सौंपने से इंकार करना चंद शासक की स्वतंत्रता-प्रियता, साहस और शरणागत-रक्षा की भावना को दर्शाता है। विशेष बात यह है कि इस घटना का उल्लेख अब्दुल्ला की ‘तवारीख-ए-दाऊदी’ जैसे मुस्लिम ऐतिहासिक स्रोत में मिलता है और उसमें कुमाऊँ के राजा के इस व्यवहार की प्रशंसा भी की गई है। इसलिए मानिकचंद का काल कुमाऊँ के चंद शासकों की राजनीतिक स्वायत्तता और वीर परंपरा को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

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