गढ़वाल सभा (1914 ई.)
परिचय
उत्तराखण्ड में बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में सामाजिक सुधार, शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के विकास के लिए अनेक संस्थाओं का गठन हुआ। इन संस्थाओं ने समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने, शिक्षा का प्रसार करने तथा क्षेत्रीय भाषा एवं साहित्य को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों के प्रयासों को एकजुट करने के उद्देश्य से गढ़वाल सभा का गठन किया गया। इस सभा ने सामाजिक सुधारवादी गतिविधियों को संगठित करने तथा गढ़वाली साहित्य के संकलन और प्रकाशन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख तथ्य
- गढ़वाल सभा का गठन 1914 ई. में किया गया था।
- गढ़वाल में सुधारवादी कार्यक्रमों को संगठित रूप से चलाने के उद्देश्य से विभिन्न संस्थाओं एवं समाचार-पत्रों के एकीकरण द्वारा इस सभा का गठन हुआ।
- 1915 ई. में गढ़वाल सभा ने ‘गढ़वाली’ मासिक पत्र को साप्ताहिक बना दिया।
- 1916 ई. के बाद गढ़वाल सभा द्वारा गढ़वाली साहित्य के संकलन एवं प्रकाशन का कार्य प्रारंभ किया गया।
- गढ़वाल सभा से जुड़े अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तिगत स्तर पर सामाजिक सुधार के कार्य किए।
- इन सुधारवादियों में कृपाराम मिश्र तथा धनानंद खंडूरी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
- धनानंद खंडूरी को ‘गढ़वाल का दानवीर कर्ण’ कहा जाता है।
- धनानंद खंडूरी ने मेधावी विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 80,000 रुपये की पूँजी लगाकर चंद्र वल्लभ ट्रस्ट की स्थापना में सहयोग दिया।
निष्कर्ष
गढ़वाल सभा उत्तराखण्ड में सामाजिक सुधार, शिक्षा और साहित्यिक विकास के लिए किए गए संगठित प्रयासों का महत्वपूर्ण उदाहरण थी। इसने विभिन्न संस्थाओं एवं समाचार-पत्रों के प्रयासों को एक मंच पर लाने का कार्य किया। ‘गढ़वाली’ पत्र को साप्ताहिक बनाना तथा गढ़वाली साहित्य के संकलन एवं प्रकाशन को प्रोत्साहित करना इसकी प्रमुख गतिविधियों में शामिल था। कृपाराम मिश्र और धनानंद खंडूरी जैसे व्यक्तियों के सुधारवादी एवं शैक्षिक योगदान ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इस प्रकार गढ़वाल सभा ने क्षेत्रीय सामाजिक चेतना, शिक्षा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।