उत्तराखंड में शकों का शासन |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

शक मध्य एशिया से भारत में आने वाली प्रमुख विदेशी जातियों में से एक थे। उन्होंने लगभग ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की। भारत में शक सत्ता मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी भारत, पश्चिमी भारत और मध्य भारत में विकसित हुई। शक शासकों ने सामान्यतः क्षत्रप तथा महाक्षत्रप की उपाधियाँ धारण कीं। इनके शासन का भारतीय इतिहास में राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रमुख तथ्य

  • शक मूलतः मध्य एशिया से भारत की ओर आए थे।
  • भारत में शक शक्ति का उदय मुख्यतः ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में हुआ।
  • शक शासकों की प्रमुख उपाधियाँ क्षत्रप और महाक्षत्रप थीं।
  • भारत में शक सत्ता की प्रमुख शाखाओं में पश्चिमी क्षत्रप सबसे महत्वपूर्ण थे।
  • पश्चिमी क्षत्रपों का मुख्य क्षेत्र मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र और पश्चिमी भारत था।
  • मौएस (Maues) को भारत में प्रारम्भिक शक शासकों में महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • रुद्रदामन प्रथम पश्चिमी क्षत्रपों का सबसे प्रसिद्ध शासक था।
  • रुद्रदामन प्रथम ने महाक्षत्रप की उपाधि धारण की थी
  • रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख शक इतिहास का प्रमुख स्रोत है।
  • जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील की मरम्मत का उल्लेख मिलता है।
  • रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख को प्रमुख संस्कृत अभिलेखों में से एक माना जाता है।
  • शक संवत का प्रारम्भ 78 ईस्वी से माना जाता है।
  • शक संवत का प्रयोग भारतीय प्रशासनिक एवं कालगणना परंपरा में लंबे समय तक होता रहा।
  • बाद में विभिन्न भारतीय शक्तियों के उदय के साथ शक सत्ता का प्रभाव कमजोर हुआ।
  • उत्तर-पश्चिमी भारत में शक शक्ति के बाद कुषाणों का प्रभाव तेजी से बढ़ा।

प्रमुख शक शासक

  • मौएस (Maues) — प्रारम्भिक शक शासकों में प्रमुख.
  • रुद्रदामन प्रथम — पश्चिमी क्षत्रपों का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक।
  • नहपान — पश्चिमी भारत का महत्वपूर्ण शक शासक।
  • चष्टन (Chastana) — पश्चिमी क्षत्रप वंश का प्रमुख शासक।
  • रुद्रसिंह आदि — बाद के पश्चिमी क्षत्रप शासक।

निष्कर्ष

शकों का भारतीय इतिहास में महत्व केवल एक विदेशी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय राजनीतिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था में उनके क्रमिक समावेश के कारण भी है। उन्होंने क्षत्रप व्यवस्था के माध्यम से पश्चिमी भारत में सुदृढ़ शासन स्थापित किया। रुद्रदामन प्रथम का शासन शक शक्ति के उत्कर्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि जूनागढ़ अभिलेख उनके प्रशासन एवं सार्वजनिक कार्यों की जानकारी देता है। कालांतर में शक सत्ता कमजोर हुई और कुषाणों जैसी नई शक्तियों के उदय से उत्तर-पश्चिमी भारत में उनका प्रभुत्व समाप्त होने लगा। इस प्रकार शक काल भारतीय इतिहास में संक्रमण एवं राजनीतिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण चरण था।

उत्तराखंड में शकों का शासन

परिचय

कुणिन्द शासक अमोघभूति के बाद उत्तराखंड के इतिहास में एक संक्रमणकाल दिखाई देता है। इस अवधि में मैदानी क्षेत्रों में शक शक्ति का प्रभाव बढ़ा और उसका प्रभाव उत्तराखंड के कुछ भागों तक भी माना जाता है। उत्तराखंड में शकों के प्रत्यक्ष शासन के प्रमाण सीमित हैं, इसलिए उनके प्रभाव को मुख्यतः सांस्कृतिक एवं कालगत साक्ष्यों के आधार पर समझा जाता है।

प्रमुख तथ्य

  • अमोघभूति की मृत्यु के बाद मैदानी प्रदेशों पर शकों का अधिकार हो गया।
  • कुमाऊं क्षेत्र में शक संवत का प्रचलन तथा सूर्य-मूर्तियों एवं मंदिरों की उपस्थिति को शकों के प्रभाव से जोड़ा जाता है।
  • अल्मोड़ा के कोसी के पास स्थित कटारमल सूर्य मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  • उत्तराखंड में शकों का प्रभाव कुणिन्दों के बाद के राजनीतिक संक्रमण से संबंधित माना जाता है।
  • शकों के बाद उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में कुषाणों का प्रभाव एवं अधिकार स्थापित हुआ।
  • इस प्रकार उत्तराखंड के इतिहास में कुणिन्द → शक प्रभाव → कुषाण प्रभाव का क्रम देखने को मिलता है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में शकों का शासन कुणिन्दों के बाद के राजनीतिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण चरण था। हालांकि उनके प्रत्यक्ष शासन के प्रमाण सीमित हैं, फिर भी शक संवत तथा सूर्य-उपासना से जुड़े साक्ष्यों के आधार पर कुमाऊं क्षेत्र में उनके प्रभाव की चर्चा की जाती है। बाद में शकों के स्थान पर कुषाण शक्ति का प्रभुत्व स्थापित हुआ, जिससे उत्तराखंड का क्षेत्र व्यापक कुषाण राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ गया।

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