राजा शिव सिंह उर्फ शिव चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा शिव सिंह, जिन्हें शिव चंद के नाम से भी जाना जाता है, चंद वंश के अंतिम चरण के शासकों में थे। उनके समय में कुमाऊँ की वास्तविक राजनीतिक शक्ति काफी हद तक हर्षदेव जोशी जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के हाथों में थी। प्रद्युम्न शाह के कुमाऊँ से अलग होने के बाद सत्ता के पुनर्गठन में हर्षदेव जोशी ने निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी शक्तिशाली सेना तैयार करके 1786 ई. में पालीगाँव के युद्ध में मोहन चंद को पराजित किया और शिव सिंह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया। परंपरा में उन्हें चंद वंश का 61वाँ शासक तथा ‘मिट्टी का महादेव’ कहा जाता है। उनका शासन चंद सत्ता के अंतिम संघर्षपूर्ण चरण का हिस्सा था।
प्रमुख तथ्य
- 1786 ई. में हर्षदेव जोशी ने शक्तिशाली सेना तैयार कर मोहन चंद के विरुद्ध अभियान चलाया।
- पालीगाँव के युद्ध में हर्षदेव जोशी ने मोहन चंद को पराजित किया।
- मोहन चंद की पराजय के बाद हर्षदेव जोशी ने शिव सिंह को कुमाऊँ का शासक बनाया।
- शिव सिंह को ‘शिव चंद’ के नाम से भी जाना जाता है।
- परंपरा के अनुसार शिव सिंह को चंद वंश का 61वाँ शासक माना गया है।
- शिव चंद को इतिहास एवं लोकपरंपरा में ‘मिट्टी का महादेव’ कहा जाता है।
- उनके राज्यारोहण में हर्षदेव जोशी की निर्णायक भूमिका थी, जिससे इस काल में राजा की अपेक्षा शक्तिशाली मंत्रियों की बढ़ती भूमिका का संकेत मिलता है।
निष्कर्ष
राजा शिव सिंह उर्फ शिव चंद चंद वंश के अंतिम राजनीतिक संघर्षों के दौर के शासक थे। उनके सिंहासनारोहण में हर्षदेव जोशी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1786 ई. के पालीगाँव युद्ध में मोहन चंद को पराजित करने के बाद हर्षदेव जोशी ने शिव सिंह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया। इससे स्पष्ट होता है कि इस समय तक चंद राज्य की राजसत्ता पर प्रभावशाली दरबारियों और मंत्रियों का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। शिव सिंह का शासन दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता स्थापित नहीं कर सका और चंद राज्य शीघ्र ही बाहरी शक्तियों के दबाव में आ गया। उन्हें परंपरा में ‘मिट्टी का महादेव’ कहा जाता है। चंद वंश की अंतिम अवस्था को समझने में उनका काल महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके बाद कुमाऊँ की राजसत्ता तेजी से कमजोर हुई और अंततः गोरखों के अधीन कुमाऊँ जाने की प्रक्रिया पूरी हुई।