राजा मोहन चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा मोहन चंद चंद वंश के उत्तरकालीन इतिहास में अत्यंत विवादास्पद शासक थे। उन्होंने राजा दीपचंद की मृत्यु के बाद उत्पन्न सत्ता-शून्यता का लाभ उठाकर कुमाऊँ की गद्दी पर अधिकार कर लिया। उन्होंने हर्षदेव जोशी को बंदी बनाया, किंतु हर्षदेव बाद में भाग निकलने में सफल रहे। इसके बाद हर्षदेव जोशी ने गढ़वाल के राजा ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 1779 ई. के बग्वाली पोखर युद्ध में मोहन चंद पराजित होकर लखनऊ भाग गए। बाद में गढ़वाल की सहायता से प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया गया। मोहन चंद की एक विशेषता यह थी कि वे दो बार कुमाऊँ की गद्दी पर बैठने वाले चंद शासक माने जाते हैं।
प्रमुख तथ्य
- मोहन चंद ने दीपचंद की गद्दी पर अधिकार कर लिया और हर्षदेव जोशी को बंदी बना लिया।
- हर्षदेव जोशी किसी प्रकार कैद से भाग निकलने में सफल हुए।
- हर्षदेव ने गढ़वाल के शासक ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया।
- 1779 ई. में बग्वाली पोखर का युद्ध ललितशाह की सेना और मोहन चंद के बीच हुआ।
- इस युद्ध में मोहन चंद पराजित होकर लखनऊ भाग गए।
- ललितशाह ने अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को चंद राज्य की गद्दी पर ‘प्रद्युम्न चंद’ के नाम से बैठाया।
- हर्षदेव जोशी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।
- मोहन चंद ने बाद में सिंहासन खाली होने का लाभ उठाकर दूसरी बार कुमाऊँ की गद्दी पर अधिकार किया।
- इसलिए कुमाऊँ की गद्दी पर दो बार बैठने वाला चंद शासक—मोहन चंद माना जाता है।
- मोहन चंद ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए नागा बाबाओं की सेना तैयार की थी।
निष्कर्ष
राजा मोहन चंद का काल चंद राज्य में उत्तराधिकार संघर्ष और बाहरी हस्तक्षेप की बढ़ती स्थिति को दर्शाता है। दीपचंद की मृत्यु के बाद उन्होंने सत्ता पर अधिकार किया, लेकिन हर्षदेव जोशी के विरोध के कारण उनका शासन स्थिर नहीं रह सका। हर्षदेव ने गढ़वाल के राजा ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया और 1779 ई. के बग्वाली पोखर युद्ध में मोहन चंद पराजित हुए। इसके बाद प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया गया। फिर भी मोहन चंद ने राजनीतिक अवसर का लाभ उठाकर दूसरी बार सिंहासन प्राप्त किया। इस कारण उनका नाम चंद इतिहास में दो बार गद्दी पर बैठने वाले शासक के रूप में विशेष रूप से याद किया जाता है। उनकी नागा साधुओं की सेना भी उत्तरकालीन कुमाऊँ की सैन्य राजनीति की महत्वपूर्ण घटना थी।