राजा बाज बहादुर चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा बाज बहादुर चंद चंद वंश के सबसे महत्वपूर्ण और दीर्घकालीन शासकों में से एक थे। उनके शासनकाल में कुमाऊँ राज्य ने राजनीतिक विस्तार, मुगल संबंध, गढ़वाल से संघर्ष, तिब्बत अभियान तथा प्रशासनिक पुनर्गठन के अनेक चरण देखे। सत्ता संभालने के समय चंद राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, क्योंकि नौलखिया माल अथवा चौरासी माल (तराई-भाबर) पर कटेहरी राजपूतों का अधिकार हो गया था। बाज बहादुर ने मुगल दरबार से कूटनीतिक संबंध स्थापित कर इस क्षेत्र को पुनः प्राप्त किया। उन्होंने 1670 ई. में तिब्बत अभियान चलाकर ताकलखाल का किला जीता और मानसरोवर यात्रा तथा भोटान्तिक व्यापार की सुरक्षा का प्रयास किया। धार्मिक दृष्टि से भी वे सक्रिय थे तथा उनके समय में अनेक मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार हुआ।

प्रमुख तथ्य

  • राजा लक्ष्मीचंद के बाद सत्ता-संघर्ष के कारण नौलखिया माल अथवा चौरासी माल (तराई माल) पर कटेहरी राजपूतों ने अधिकार कर लिया था।
  • यह क्षेत्र लगभग चौरासी कोस लंबे भू-भाग में फैला था और इससे चंद राजाओं को प्रतिवर्ष लगभग नौ लाख रुपये की आमदनी होती थी। इसके हाथ से निकल जाने के कारण चंद राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई थी।
  • बाज बहादुर ने बहुमूल्य उपहारों के साथ मुगल बादशाह शाहजहाँ से भेंट की और कटेहर के हिंदू जमींदारों से अपने राज्य की रक्षा करने के लिए मुगल सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया।
  • जिस समय बाज बहादुर शाहजहाँ से मिले, उस समय मुगल सेना गढ़वाल अभियान की तैयारी कर रही थी। शाहजहाँ ने बाज बहादुर को भी इस अभियान में सम्मिलित होने का आदेश दिया। इस सेना का नेतृत्व खलीलुल्ला/खलीतुल्ला खाँ कर रहा था।
  • गढ़वाल अभियान में बाज बहादुर ने अपनी योग्यता और सैन्य कुशलता का परिचय दिया। उनकी राजभक्ति और मुगल अभियान में सहयोग से प्रभावित होकर उन्हें ‘बहादुर’ तथा ‘जमींदार’ की उपाधियाँ प्रदान की गईं। उन्हें नक्कारा भी दिया गया और नक्कारा बजाने की अनुमति प्राप्त हुई।
  • तराई पर पुनः अधिकार करने के लिए बाज बहादुर के साथ रुस्तम खाँ, जो मुरादाबाद का सूबेदार था, को भेजा गया। मुगल सेना की सहायता से बाज बहादुर तराई पर अधिकार करने में सफल हुए।
  • तराई में व्यवस्था स्थापित करने तथा उसे सुरक्षित बनाने के लिए उन्होंने बाजपुर नगर की स्थापना की और वहाँ अधिकारियों की नियुक्ति की।
  • 1658–59 ई. में मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार युद्ध हुआ, जिसमें औरंगजेब विजयी हुआ और दारा शिकोह की हत्या कर दी गई। दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह ने कुमाऊँ में शरण लेने का प्रयास किया, लेकिन बाज बहादुर ने कूटनीति अपनाते हुए उसे अपने राज्य में शरण देने के बजाय गढ़वाल के राजा पृथ्वीपति शाह के पास भेज दिया। इस प्रकार वे तत्कालीन शाही दबाव से अपने राज्य को बचाने में सफल रहे।
  • बाज बहादुर ने अपने दीर्घ शासनकाल में तिब्बत अभियान भी चलाया। इसका प्रमुख उद्देश्य मानसरोवर यात्रा तथा तिब्बत-भोटान्तिक व्यापार मार्ग को सुरक्षित करना था।
  • उस समय मानसरोवर यात्रा और तिब्बत-भोटान्तिक व्यापार मार्ग पर हुणियों के कारण असुरक्षा व्याप्त थी। बाज बहादुर ने अभियान चलाकर उनके प्रभाव को दबाने का प्रयास किया।
  • 1670 ई. के तिब्बत अभियान में बाज बहादुर ने ताकलखाल का किला जीत लिया।
  • बाज बहादुर के समय भी कुमाऊँ के चंद और गढ़वाल के पंवार राज्य के संबंध शत्रुतापूर्ण बने रहे। उन्होंने गढ़वाल के विरुद्ध अपनी सैन्य नीति जारी रखी।
  • जब बाज बहादुर तिब्बत अभियान में व्यस्त थे, तब गढ़वाल की पंवार सेना ने चंद राज्य पर आक्रमण किया। तिब्बत से लौटने के बाद बाज बहादुर ने लोहागढ़ और बधानगढ़ पर आक्रमण किया तथा पंवार सेना को श्रीनगर तक पीछे हटने के लिए विवश कर दिया।
  • इस संघर्ष के बाद गढ़वाल के पंवार राजा को बाज बहादुर से संधि करनी पड़ी। संधि के अनुसार पंवार राजा ने उन्हें उपहार तथा सैनिक खर्च दिया और बाज बहादुर ने विजित क्षेत्रों को वापस कर दिया।
  • बाज बहादुर ने गढ़वाल से नंदा देवी की मूर्ति लाकर अल्मोड़ा के मल्ला महल में स्थापित की। बाद में ट्रेल साहब ने इसे वहाँ से हटाकर वर्तमान स्थान पर स्थापित कराया।
  • बाज बहादुर ने कत्यूरी राजकुंवरों के मानिला-गढ़ पर आक्रमण किया और उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया। इसके बाद इन कत्यूरी राजकुंवरों ने गढ़वाल के पूर्वी क्षेत्रों में लूट-पाट शुरू कर दी।
  • कत्यूरी राजकुंवरों के विरुद्ध संघर्ष की इसी परंपरा से आगे चलकर तीलू रौतेली के युद्धों को भी जोड़ा जाता है। तीलू रौतेली को इन शक्तियों को गढ़वाल की सीमाओं से बाहर करने के लिए हथियार उठाने की लोकपरंपरा मिलती है।
  • 1673 ई. में बाज बहादुर चंद ने कैलाश-मानसरोवर के तीर्थयात्रियों के लिए ‘गूँठ भूमिदान’ दिया। ‘गूँठ’ ऐसी भूमि को कहा जाता था जिसकी आय मंदिरों की देखभाल तथा पुजारियों एवं धार्मिक कार्यों के खर्च के लिए निर्धारित होती थी।
  • उन्होंने भोटियों और शौकाओं द्वारा तिब्बत को दिए जाने वाले दस्तूर पर रोक लगाई। बाद में तिब्बतियों के अनुरोध पर इसे पुनः जारी कर दिया गया।
  • मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के भोजन, वस्त्र और ठहरने की व्यवस्था के लिए उन्होंने पाँच गाँवों की मालगुजारी निर्धारित की तथा अस्कोट के रजवार को अपने क्षेत्र में सुव्यवस्था एवं न्याय स्थापित करने की हिदायत दी।
  • बाज बहादुर ने भोटियों और हुणियों से ‘सिरती’ नामक कर लिया। यह कर नकद रूप में वसूल किया जाता था।
  • 1669 ई. में बाज बहादुर सोर गए। उस समय सोर को ‘सोर खड़ायत’ परगना कहा जाता था। उन्होंने उर्ग गाँव से संबंधित पूर्व भूमि व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए रतन जोशी को तल्ला रयांसी में ज्युला भूमि प्रदान की।
  • इसी यात्रा के दौरान बाज बहादुर की डोटी के राजा देवपाल से भेंट हुई थी।
  • ब्रह्मदेव मंडी के पास चितौना के राजा ने कालीघाट के ऊपर किला बनाकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। बाज बहादुर ने उसके विरुद्ध कार्रवाई करते हुए चितौना के राजा को फाँसी दे दी।
  • बाज बहादुर ने अपने दरबार को मुगल दरबार की शैली के अनुरूप व्यवस्थित करने का प्रयास किया। उन्होंने अनेक नए पद बनाए और कर्मचारियों के कार्य के अनुसार उनके नाम निर्धारित किए।

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