परमार/पंवार वंश की सैन्य व्यवस्था

परिचय

पंवार राज्य की भौगोलिक एवं राजनीतिक स्थिति ऐसी थी कि उसे लगभग सभी दिशाओं से बाहरी शक्तियों और पड़ोसी राज्यों का सामना करना पड़ता था। पूर्व में चंद, पश्चिम में सिरमौर, उत्तर में तिब्बती क्षेत्र तथा दक्षिण में मैदानी शक्तियों से संभावित संघर्ष के कारण सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था राज्य की प्रमुख आवश्यकता थी। पंवार राजाओं ने एक संगठित एवं शक्तिशाली सेना का निर्माण किया। सेना में स्थानीय गढ़वाली सैनिकों के साथ बाद में मैदानी क्षेत्रों से आए हिंदू एवं मुस्लिम आयुधजीवियों को भी शामिल किया गया। पैदल एवं घुड़सवार सैनिकों के साथ युद्ध में धनुष-बाण, तलवार-ढाल, बंदूक और तोप जैसे हथियारों का प्रयोग किया जाता था।

पंवार/परमार वंश की सैन्य व्यवस्था

  • पंवार राज्य चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ था, इसलिए राज्य की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली सेना का होना आवश्यक था।
  • पंवार राजाओं ने राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सैन्य व्यवस्था स्थापित की।
  • राजा राज्य का सर्वोच्च सेनापति होता था। उसके अधीन सैन्य अभियानों के लिए एक से अधिक सेनापति नियुक्त किए जाते थे।
  • महत्वपूर्ण युद्धों में राजा स्वयं सेना का नेतृत्व करता था, जबकि अन्य सैन्य अभियानों का नेतृत्व उसके सेनापति करते थे।
  • प्रारंभ में गढ़ सेना विभिन्न पलटनों में विभाजित थी। इन्हें लोहवा, बधाण तथा सलाण कहा जाता था।
  • प्रारंभिक काल में सेना में मुख्यतः गढ़वाली सैनिकों को ही भर्ती किया जाता था। बाद में मैदानी क्षेत्रों से आए हिंदू एवं मुस्लिम आयुधजीवी सैनिकों को भी सेना में शामिल किया जाने लगा।
  • पंवार नरेश अपने सैनिकों की नियुक्ति स्वयं करने के बजाय फौजदारों एवं गोलदारों के माध्यम से करवाते थे।
  • अधीनस्थ सैनिकों के वेतन की व्यवस्था के लिए फौजदार को किसी परगने की जागीर तथा गोलदार को नकद राशि दी जाती थी।
  • आवश्यकता पड़ने पर भाड़े के सैनिकों को भी युद्ध में नियुक्त किया जाता था।
  • युद्ध में वीरता दिखाने वाले सैनिकों को पुरस्कारस्वरूप भूमि प्रदान की जाती थी। ऐसी भूमि को ‘रौत’ कहा जाता था।
  • सैनिक के लिए सुदृढ़ शरीर, धनुष-बाण तथा ढाल-तलवार चलाने की दक्षता आवश्यक मानी जाती थी। संभव होने पर बंदूक चलाने का अभ्यास भी सैनिक की योग्यता का हिस्सा था।
  • हार्डविक के अनुसार गढ़वाली सेना तोड़ादार बंदूक, धनुष-बाण तथा ढाल-तलवार का प्रयोग करती थी।
  • पादरी एजेंविडो ने गढ़वाली सेना में छोटी तोपों के प्रयोग का भी उल्लेख किया है।
  • पंवारों की सेना मुख्यतः पैदल तथा घुड़सवार सैनिकों में विभाजित थी।
  • पंवार राजाओं के पास एक विशाल सेना होने का उल्लेख मिलता है। मौलाराम ने महीपति शाह तथा प्रदीप शाह के पास लगभग सवा लाख सैनिकों की सेना होने का उल्लेख किया है।
  • शिव प्रसाद डबराल के अनुसार पंवार राजाओं के पास लगभग 20,000 सैनिकों की स्थायी सेना थी।
  • युद्धों में पारंपरिक हथियारों के साथ तोप एवं बंदूक का भी प्रयोग किया जाता था। इससे पंवार सैन्य व्यवस्था में समय के साथ आग्नेयास्त्रों एवं तोपखाने के समावेश का संकेत मिलता है।

निष्कर्ष

पंवार/परमार राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों ने उसकी सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजा सर्वोच्च सेनापति था और उसके अधीन सेनापति, फौजदार तथा गोलदार सैन्य व्यवस्था को संचालित करते थे। प्रारंभ में सेना मुख्यतः स्थानीय गढ़वाली सैनिकों पर आधारित थी, लेकिन बाद में मैदानी क्षेत्रों के हिंदू एवं मुस्लिम सैनिकों तथा भाड़े के सैनिकों को भी इसमें शामिल किया गया। सैनिकों को भूमि पुरस्कार ‘रौत’ के रूप में देने की व्यवस्था भी थी। धनुष-बाण और तलवार-ढाल जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ बंदूक और तोप का प्रयोग पंवार सैन्य व्यवस्था के क्रमिक आधुनिकीकरण को दर्शाता है। इस प्रकार सैन्य शक्ति पंवार राज्य की सुरक्षा, विस्तार और राजनीतिक स्थायित्व का एक महत्वपूर्ण आधार थी।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *