पश्चिमी सीमान्त का राणा देवपाल |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कार्तिकेयपुरवंशीय सत्ता के पतन के बाद उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्वतंत्र स्थानीय राजवंशों और गढ़पतियों का उदय हुआ। पश्चिमी सीमान्त पर स्थित ऐसा ही एक शक्तिशाली गढ़पति राणा देवपाल था, जिसका राज्य वर्तमान सिरमौर-सिरमौर क्षेत्र तथा पश्चिमी दून से संबंधित माना जाता है। राणा देवपाल की जानकारी अत्यंत सीमित है और उसके संबंध में मुख्य ऐतिहासिक स्रोत मुस्लिम इतिहासकार सिराज की ‘तबकात-ए-नासिरी’ है। इससे उसके राजनीतिक प्रभाव, दुर्गों तथा दिल्ली सल्तनत के साथ संघर्ष की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
प्रमुख बिंदु
- केदारभूमि के पश्चिमी सीमान्त, सिरमौर प्रदेश, के गढ़पति राणा देवपाल के संबंध में सूचना का एकमात्र प्रमुख स्रोत सिराज की ‘तबकात-ए-नासिरी’ है।
- इसके अनुवादकों ने इस गढ़पति का नाम रणपाल अथवा राणा देवपाल के रूप में लिखा है।
- मुस्लिम इतिहासकार सिराज ने राणा देवपाल को एक शक्तिशाली गढ़पति बताया है।
- नासिरी के अनुसार, अन्य हिन्दू गढ़पति उसे अपने बीच महान् मानते थे तथा उसकी वंशानुगत परंपरा शरणागतों को आश्रय प्रदान करना थी।
- राणा देवपाल की शक्ति का प्रमुख केन्द्र ‘सुन्तूर’ का सुदृढ़ दुर्ग था।
- तबकात-ए-नासिरी में सुन्तूर दुर्ग पर मुसलमानों के अनेक आक्रमणों का उल्लेख मिलता है।
- उसके राज्य का दूसरा प्रमुख दुर्ग-नगर ‘सलमूर’ अथवा ‘सरमूर’ था।
- इस प्रकार पश्चिमी दून का सुन्तूर तथा उसके आसपास का पर्वतीय क्षेत्र राणा देवपाल के राज्य का महत्वपूर्ण भाग था।
- सुन्तूरगढ़ और सिलमूर/सिरमौर नामक दोनों दुर्ग-नगरों के स्थान पर बाद के समय में सिरमौर राजाओं की राजधानियाँ स्थापित हुई थीं।
- तबकात-ए-नासिरी के अनुसार, लगभग 1255 ई. में राणा देवपाल ने दिल्ली के नासिरुद्दीन महमूद तथा बलबन के विरोधियों को अपने राज्य में शरण दी।
- राणा देवपाल द्वारा शरण दिए जाने के कारण नायब बलबन ने लगभग 1257 ई. में सुन्तूरगढ़ और सलमूर के दुर्ग-नगरों पर आक्रमण किया।
- बलबन की सेना ने इन क्षेत्रों को क्रूरतापूर्वक लूटा तथा वहाँ के हिन्दुओं पर अत्याचार किए।
- तबकात-ए-नासिरी में इस अभियान के दौरान हिन्दुओं पर किए गए लोमहर्षक अत्याचारों का उल्लेख मिलता है।
- बलबन का अभियान मुख्यतः लूटपाट तक सीमित रहा। वह राणा देवपाल की शक्ति को पूरी तरह समाप्त करने में सफल नहीं हुआ।
- तबकात-ए-नासिरी में यह भी संकेत मिलता है कि इससे पूर्व मुस्लिम सेना इस क्षेत्र में नहीं पहुँची थी।
- सम्भवतः 15वीं शती के अंतिम दशक में पँवार राजा अजयपाल ने राणा देवपाल के राज्य पर अधिकार कर लिया।
- आइने-अकबरी से ज्ञात होता है कि शाहजहाँ के शासनकाल में सुन्तूरगढ़ पर श्रीनगर के राजा का अधिकार था।
निष्कर्ष
राणा देवपाल पश्चिमी उत्तराखण्ड में कार्तिकेयपुरवंशीय सत्ता के पतन के बाद विकसित हुई स्थानीय गढ़पति परंपरा का एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि था। उसकी सत्ता का केन्द्र सुन्तूरगढ़ था और सलमूर उसका दूसरा प्रमुख दुर्ग-नगर था। उसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसकी सैन्य शक्ति तथा शरणागतों को संरक्षण देने की परंपरा थी। लगभग 1255 ई. में दिल्ली सल्तनत के विरोधियों को आश्रय देने के कारण बलबन ने उसके राज्य पर अभियान किया, परंतु वह राणा देवपाल की शक्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका। इससे पश्चिमी सीमान्त के इस गढ़पति की राजनीतिक शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। बाद में इस क्षेत्र पर पँवारों का प्रभाव स्थापित हुआ और आगे चलकर सुन्तूरगढ़ श्रीनगर के राजाओं के अधिकार में रहा। इस प्रकार राणा देवपाल का इतिहास मध्यकालीन उत्तराखण्ड की बहुराजकता, स्थानीय गढ़पतियों की शक्ति और दिल्ली सल्तनत के साथ पर्वतीय क्षेत्रों के प्रारंभिक संपर्क को समझने में महत्वपूर्ण है।