कत्यूरी रानी जियारानी |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
जियारानी कुमाऊँ की प्रसिद्ध वीरांगना, राजमाता और लोकगाथाओं में वर्णित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक-लोकपात्र हैं। उनका जीवन कुमाऊँ की लोकपरंपराओं, धार्मिक आस्था और वीरता की कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। लोकमान्यता के अनुसार उनका बचपन का नाम मौला देवी था और वे हरिद्वार क्षेत्र के शासक माने जाने वाले अमरदेव पुंडीर की पुत्री थीं। उनका विवाह कत्यूरी राजा प्रीतम देव (पृथ्वीपाल) से हुआ तथा उनके पुत्र के रूप में धामदेव का उल्लेख मिलता है। रानीबाग, हल्द्वानी क्षेत्र में उनसे संबंधित गुफा, चित्रशिला और मकर संक्रांति पर होने वाली पूजा आज भी उनकी लोकस्मृति को जीवित रखती है। हालांकि, उनके जीवन की अनेक घटनाएँ लोकगाथाओं और जनश्रुतियों पर आधारित हैं।
जियारानी प्रमुख तथ्य
- जियारानी उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की प्रसिद्ध वीरांगना एवं लोकगाथाओं में वर्णित राजमाता थीं।
- लोकपरंपराओं के अनुसार, जियारानी का बचपन का नाम मौला देवी था।
- उनके पिता का नाम अमरदेव पुंडीर बताया जाता है, जिन्हें हरिद्वार क्षेत्र का शासक माना जाता है।
- जियारानी का विवाह कत्यूरी राजा प्रीतम देव (पृथ्वीपाल) से हुआ था।
- जियारानी को लोकपरंपरा में कत्यूरी राजवंश की राजमाता के रूप में जाना जाता है।
- उनके पुत्र का नाम धामदेव बताया जाता है।
- लोकपरंपराओं के अनुसार, प्रसिद्ध लोकनायक मालूशाही से जियारानी का संबंध दादी के रूप में बताया जाता है।
- जियारानी का समय लगभग 15वीं शताब्दी माना जाता है, हालांकि उनके काल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं।
- जियारानी का संबंध वर्तमान रानीबाग, हल्द्वानी (नैनीताल) क्षेत्र से माना जाता है।
- लोकमान्यता के अनुसार, जियारानी ने रानीबाग में एक सुंदर बाग लगवाया था। इसी कारण इस स्थान का नाम रानीबाग पड़ा।
- जियारानी को भगवान शिव की परम भक्त माना जाता है और उनकी धार्मिक आस्था से संबंधित अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं।
- लोकगाथाओं के अनुसार, तुर्कों के आक्रमण के समय जियारानी ने कुमाऊँ क्षेत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया था।
- कुछ प्रचलित कथाओं में जियारानी के संघर्ष को तैमूर के 1398 ई. के आक्रमण से भी जोड़ा जाता है, लेकिन इस संबंध का ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
- रानीबाग की जियारानी गुफा उनके जीवन से जुड़ी प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक लोकपरंपरा का केंद्र मानी जाती है।
- रानीबाग स्थित चित्रशिला को लोकमान्यता के अनुसार जियारानी के घाघरे से संबंधित माना जाता है।
- लोककथा के अनुसार, शत्रुओं से बचने के लिए जियारानी एक गुफा में चली गईं और वहीं अंतर्ध्यान हो गईं।
- जियारानी को कत्यूरी वंश के लोगों की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता है।
- प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर रानीबाग में जियारानी की पूजा तथा जागर का आयोजन किया जाता है।
- जियारानी की वीरता, संघर्ष, धार्मिक आस्था और त्याग से जुड़ी गाथाएँ कुमाऊँ की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- जियारानी से संबंधित विवरणों में लोकगाथा, जनश्रुति और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए उनके जीवन की घटनाओं, वंशावली और तिथियों को प्रस्तुत करते समय ऐतिहासिक प्रमाण और लोकमान्यता के बीच अंतर रखना आवश्यक है।
निष्कर्ष
जियारानी कुमाऊँ की लोकस्मृति में वीरता, त्याग, संघर्ष और धार्मिक आस्था की प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। रानीबाग से जुड़ी उनकी गुफा, चित्रशिला, पूजा और जागर जैसी परंपराएँ आज भी उनके प्रभाव को दर्शाती हैं। उनके जीवन को कत्यूरी राजवंश, धामदेव और मालूशाही की लोकपरंपराओं से जोड़ा जाता है। हालांकि जियारानी के जीवन से संबंधित अनेक विवरण लिखित ऐतिहासिक स्रोतों की अपेक्षा लोकगाथाओं और जनश्रुतियों पर आधारित हैं। विशेष रूप से उनके काल, वंशावली तथा तैमूर के आक्रमण से संबंधित कथाओं को लोकमान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है। परीक्षा की दृष्टि से जियारानी से जुड़े रानीबाग, मौला देवी, प्रीतम देव, धामदेव, जियारानी गुफा और मकर संक्रांति के जागर जैसे तथ्य महत्वपूर्ण हैं।