तुगलक का आक्रमण |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

मुहम्मद बिन तुगलक का कराजल-अभियान 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत और हिमालयी क्षेत्र के बीच हुए महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में से एक था। यह अभियान 1337–38 ई. के आसपास चलाया गया। कराजल या कराचल नामक पर्वतीय राज्य की निश्चित पहचान आज भी विवादित है, किंतु आ. श्रीवास्तव और मेहदी हुसैन ने इसे गढ़-कुमाऊँ क्षेत्र से जोड़ने का प्रयास किया है। इस अभियान की जानकारी मुख्यतः इब्न बतूता के रेहला तथा जियाउद्दीन बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही से मिलती है। अभियान का परिणाम दिल्ली की सेना की भीषण पराजय के रूप में सामने आया।

1. मुहम्मद बिन तुगलक — संक्षिप्त परिचय

  • मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश का सुल्तान था।
  • उसका शासनकाल लगभग 1325–1351 ई. तक रहा।
  • वह गयासुद्दीन तुगलक का पुत्र और उत्तराधिकारी था।
  • मुहम्मद बिन तुगलक को उसकी महत्वाकांक्षी योजनाओं एवं सैन्य अभियानों के लिए जाना जाता है।
  • उसके शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का क्षेत्रीय विस्तार काफी व्यापक था।
  • उसने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में सैन्य अभियान चलाए।
  • उसकी महत्वपूर्ण योजनाओं में राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करना, सांकेतिक मुद्रा चलाना तथा दोआब में कर वृद्धि जैसी नीतियाँ शामिल थीं।
  • उसके शासनकाल में दक्षिण भारत, गुजरात, सिंध तथा हिमालयी क्षेत्रों की ओर भी सैन्य अभियान चलाए गए।
  • कराजल अभियान भी उसकी पर्वतीय नीति एवं सैन्य विस्तार से संबंधित महत्वपूर्ण अभियान था।
  • मुहम्मद बिन तुगलक की कई योजनाएँ अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर सकीं, जिसके कारण उसके शासनकाल को महत्वाकांक्षी लेकिन विवादास्पद नीतियों के लिए जाना जाता है।

2. कराजल-अभियान से संबंधित प्रमुख तथ्य

  • कराजल पर्वत-अभियान लगभग 1337–38 ई. में हुआ था। इसकी जानकारी के मुख्य स्रोत इब्न बतूता का रेहला तथा बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही हैं।
  • हिमालयी राज्य को कराजल या कराचल कहा गया है। इसे दिल्ली से लगभग दस दिन की यात्रा की दूरी पर बताया गया है, लेकिन इसकी निश्चित पहचान अभी तक नहीं हो पाई है।
  • आ. श्रीवास्तव और मेहदी हुसैन ने कराजल को गढ़-कुमाऊँ प्रदेश से जोड़ने का प्रयास किया है।
  • यदि कराजल की पहचान गढ़-कुमाऊँ से स्वीकार की जाए, तो उस समय गढ़देश के उत्तरी भाग पर पंवारवंशियों तथा दक्षिणी भाग पर अनेक गढ़पतियों का अधिकार था।
  • इसी समय कुमाऊँ के अधिकांश भाग पर कत्यूरी शाखाओं तथा चम्पावत में चंदवंशियों का शासन था।
  • कराजल अभियान का उद्देश्य संभवतः पर्वतीय क्षेत्र को दिल्ली सल्तनत के अधीन लाना अथवा उत्तरी पर्वतीय सीमाओं को सुदृढ़ करना था।
  • इब्न बतूता के अनुसार सुल्तान ने कोह कराचल के विरुद्ध युद्ध के लिए मलिक नकबिया के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी, जिसमें लगभग एक लाख सवार और बहुत-सी पदाति सेना थी।
  • कराजल राज्य के पाद-प्रदेश में जिदीया (जदिया) तथा पर्वतीय भाग में बारंगल (वरनगल) नामक दो नगरों का उल्लेख मिलता है। सुल्तान की सेना ने इन पर अधिकार कर इन्हें लूटा, किंतु इन दोनों स्थानों की निश्चित पहचान नहीं हो सकी है।
  • कुछ विद्वानों ने जिदीया की पहचान चंडिया (चण्डी) से की है, जबकि इब्न बतूता के एक अनुवादक की टिप्पणी में जड़या/जड़वा नामक परगने का उल्लेख आइन-ए-अकबरी के आधार पर कुमाऊँ में किया गया है।
  • सुल्तान की सेना ने इन नगरों के अतिरिक्त अनेक बौद्ध मंदिरों को भी नष्ट किया।
  • इब्न बतूता के रेहला में कराचल के राजा को सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा बताया गया है, किंतु उसका नाम नहीं दिया गया है।
  • रेहला के अनुसार सुल्तान ने कराचल के राजा के साथ कर देने की शर्त पर संधि कर ली थी। इसमें यह भी उल्लेख है कि पर्वत के नीचे के खेतों को सुल्तान की अनुमति के बिना नहीं जोता जा सकता था।
  • कराजल अभियान में दिल्ली की सेना को भीषण पराजय का सामना करना पड़ा।
  • इब्न बतूता और बरनी, दोनों के विवरण के अनुसार वापसी के समय हिन्दुओं ने शाही सेना का मार्ग रोक दिया और उसका भारी विनाश किया।
  • हिन्दुओं ने शाही सेना का कोष, घोड़े, शस्त्र तथा तिजारती सामान अपने अधिकार में ले लिया।
  • इब्न बतूता के अनुसार, पूरी मुस्लिम सेना में केवल तीन व्यक्ति जीवित बचे।
  • बरनी के अनुसार भी वापसी का मार्ग हिन्दुओं ने बंद कर दिया और एक ही आक्रमण में पूरी सेना नष्ट हो गई।
  • अभियान की इस भीषण विफलता से यह अनुमान लगाया जाता है कि कराजल के राजा द्वारा नियमित कर देने की बात संदिग्ध है।
  • कराजल अभियान की असफलता ने यह स्पष्ट किया कि पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय प्रतिरोध के सामने दिल्ली सल्तनत की विशाल सेना भी कठिनाई में पड़ सकती थी।
  • कराजल अभियान उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिल्ली सल्तनत और हिमालयी स्थानीय शक्तियों के प्रत्यक्ष सैन्य संपर्क का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है।

निष्कर्ष

मुहम्मद बिन तुगलक का कराजल अभियान (1337–38 ई.) दिल्ली सल्तनत की हिमालयी क्षेत्र में राजनीतिक एवं सैन्य विस्तार की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। कराजल की निश्चित पहचान विवादित होने के बावजूद आ. श्रीवास्तव और मेहदी हुसैन ने इसे गढ़-कुमाऊँ से जोड़ने का प्रयास किया है। अभियान में दिल्ली की विशाल सेना भेजी गई, लेकिन दुर्गम पर्वतीय भूगोल और स्थानीय हिन्दू शक्तियों के प्रतिरोध के कारण उसे विनाशकारी पराजय का सामना करना पड़ा। इब्न बतूता और बरनी के विवरण इस अभियान की विफलता की पुष्टि करते हैं। इसलिए कराजल अभियान उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास में दिल्ली सल्तनत की सीमाओं और पर्वतीय राज्यों की सैन्य क्षमता को समझने के लिए महत्वपूर्ण घटना है।

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