त्रिभुवनराज|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
त्रिभुवनराज कत्यूरी वंश के प्रथम परिवार के प्रमुख शासकों में से एक था। वह कल्याणराजदेव के पश्चात राजगद्दी पर आसीन हुआ। उसके शासनकाल की जानकारी मुख्यतः बागेश्वर शिलालेख से प्राप्त होती है। त्रिभुवनराज अपने दानशील स्वभाव, मंदिरों के संरक्षण तथा किरातों के साथ राजनीतिक संबंधों के लिए उल्लेखनीय है। उसके शासन से कत्यूरी शासकों की धार्मिक एवं कूटनीतिक नीति की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
त्रिभुवनराज प्रमुख तथ्य
- कल्याणराजदेव के पश्चात उसका पुत्र त्रिभुवनराज कत्यूरी राजगद्दी पर आसीन हुआ।
- वह दानशील एवं धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था।
- उसने अनेक मंदिरों को दान प्रदान किए।
- उसके शासनकाल में उसके भाई द्वारा भी मंदिरों को दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
- त्रिभुवनराज के किरातों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध एवं संधि थी।
- बागेश्वर शिलालेख में व्याघ्रेश्वर देवता के मंदिर को भूमि दान देने का उल्लेख मिलता है।
- मंदिरों को भूमि एवं अन्य दान दिए जाने से उसके शासन में धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण की नीति स्पष्ट होती है।
- त्रिभुवनराज को खर्परदेव से संबंधित प्रथम कत्यूरी परिवार का अंतिम शासक माना जाता है।
निष्कर्ष
त्रिभुवनराज का शासन प्रथम कत्यूरी परिवार के राजनीतिक एवं धार्मिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था। उसकी दानशीलता, मंदिरों के संरक्षण और व्याघ्रेश्वर मंदिर को भूमि दान से उसकी धार्मिक नीति स्पष्ट होती है, जबकि किरातों के साथ संधि उसकी व्यावहारिक कूटनीति को दर्शाती है। इस प्रकार त्रिभुवनराज ने कत्यूरी परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए प्रथम परिवार के शासन को एक महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुँचाया।