पौरव प्रशासन |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

पौरव वंश की प्रशासनिक व्यवस्था के संबंध में प्रमुख जानकारी तालेश्वर ताम्रपत्रों से प्राप्त होती है। इन अभिलेखों में अनेक पदाधिकारियों एवं प्रशासनिक पदों का उल्लेख मिलता है, जिनसे पौरव शासन-प्रबन्ध की संरचना का अनुमान लगाया जा सकता है। पौरव प्रशासन पर गुप्त एवं हर्षकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव दिखाई देता है। शासन का सर्वोच्च अधिकारी राजा था, जिसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद एवं विभिन्न विभागों के अधिकारी कार्य करते थे। प्रशासन में सैन्य, पुलिस, राजस्व, भूमि, न्याय एवं राजकीय सुरक्षा से संबंधित अधिकारियों की व्यवस्था थी। पौरव शासक प्रजा के हित, दान तथा धार्मिक सहिष्णुता पर भी ध्यान देते थे। पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वन, खनिज, औषधि तथा व्यापार भी राज्य की आर्थिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार रहे होंगे।

पौरव प्रशासन — प्रमुख तथ्य

1. केंद्रीय प्रशासन

  • राजा पौरव शासन का सर्वोच्च अधिकारी था। उसकी प्रमुख उपाधि ‘महाधिराज परमभट्टारक’ थी। प्रारंभिक शासकों ने कोई विशेष उपाधि धारण नहीं की थी।
  • पौरव शासक प्रजा के हित का ध्यान रखते थे तथा ‘गौ-ब्राह्मण हितैषी’ जैसे विशेषणों का प्रयोग करते थे। वे दानी प्रवृत्ति के भी थे और अभिलेखों में उनके द्वारा दिए गए दानों का उल्लेख मिलता है।
  • राजा की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती थी, जो विभिन्न प्रशासनिक विषयों पर शासक को परामर्श देती थी।
  • मंत्रिपरिषद एवं प्रशासन में अमात्य, बलाध्यक्ष, सन्धिविग्रहक, राजदौवारिक, कोटाधिकरण, कुमारामात्य, सर्वविषयप्रधान देव, द्रोणाधिकृत तथा कारगिक आदि अधिकारी सम्मिलित थे।
  • कोट वह स्थान था जहाँ राजा अपने परिवार के साथ रहता था। इसकी सुरक्षा का दायित्व कोटाधिकरण पर था।
  • प्रतिहार राजपरिवार की सुरक्षा करता था, जबकि राजदौवारिक राजप्रसाद में आने-जाने वालों की देखरेख करता था।
  • सुपकारपति राजकीय भोजनालय की व्यवस्था देखता था।
  • कारगिक राजा अथवा शासक के समक्ष की गई प्रार्थनाओं को संबंधित स्थान तक पहुँचाने का कार्य करता था।
  • दूतक संदेश अथवा राजकीय आदेश पहुँचाने वाला अधिकारी था।
  • दिविरपति लेखक वर्ग का प्रधान था, जबकि दिविरकोट लेखन संबंधी कार्य से जुड़ा अधिकारी था।

2. सैन्य प्रशासन

  • बलाध्यक्ष सेना का प्रमुख अधिकारी था।1
  • पौरव सेना मुख्यतः गज, अश्व और पैदल तीन भागों में विभक्त थी।
  • इनके प्रमुख अधिकारियों के रूप में गजपति, अश्वपति तथा जयनपति/पदातिक सेनापति का उल्लेख मिलता है।
  • तालेश्वर ताम्रपत्रों में पीलूपति पद का भी उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल में हाथी सेना के प्रमुख को महापीलूपति कहा जाता था।
  • सन्धिविग्रहक युद्ध एवं संधि संबंधी मामलों का प्रधान अधिकारी था।

3. पुलिस एवं आंतरिक सुरक्षा

  • पौरव शासन में आंतरिक शांति एवं सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था थी।
  • दण्डपासिक पुलिस अधिकारी था, जिसका उल्लेख गुप्तकालीन प्रशासन में भी मिलता है।
  • अभिलेखों में दण्डोपरिक तथा कटुक जैसे अधिकारियों का भी उल्लेख मिलता है।
  • कटुक का कार्य गुप्तचर के रूप में राज्य को सूचनाएँ उपलब्ध कराना था।

4. राजस्व प्रशासन

  • पौरव राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भूमिकर था, जिसे ‘भाग’ कहा जाता था।
  • भूमिकर वसूलने वाले अधिकारी को भागिक कहा जाता था। सामान्यतः भूमि की उपज का छठा भाग कर के रूप में लिया जाता था।
  • भोग एक अन्य सामान्य कर था, जिसे भौगिक अधिकारी द्वारा वसूल किया जाता था।
  • करिक एवं कुलचारिक भी कर-संग्रह से संबंधित अधिकारी थे।
  • हिमालयी क्षेत्र होने के कारण वन, खनिज एवं औषधीय संसाधन भी राज्य की आय के स्रोत रहे होंगे।
  • भोटान्तिक व्यापार भी राज्य की आय में वृद्धि करने वाला महत्वपूर्ण साधन रहा होगा।
  • दिविरपति तथा कायस्थ राज्य की आय एवं भूमि से संबंधित सूचनाओं का लेखा-जोखा रखते थे।

5. भूमि प्रशासन

  • इस काल में भूमि के दो प्रमुख वर्गों का उल्लेख मिलता है—‘केदार’ एवं ‘सारी’।
  • केदार भूमि सिंचित भूमि तथा सारी भूमि असिंचित भूमि मानी जाती थी।
  • भूमि की माप के लिए द्रोणवापम, खारिवापम एवं कुल्यवापम जैसी इकाइयों/विधियों का प्रयोग किया जाता था।
  • भूमि पर शासक का सर्वोच्च अधिकार माना जाता था तथा वह भूमि का दान एवं विक्रय कर सकता था।

6. प्रांतीय प्रशासन

प्रशासनिक इकाईअधिकारी
देशराजा
भुक्ति(प्रान्त)भुक्तिपति
विषय(जिला)विषयपति
पाठक(तहसील)पाठकपति
ग्रामग्रामक्ष/पटलिक

निष्कर्ष

पौरव वंश की प्रशासनिक व्यवस्था एक संगठित एवं बहुस्तरीय शासन प्रणाली पर आधारित थी। राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी था, जिसकी सहायता मंत्रिपरिषद तथा विभिन्न विभागों के अधिकारी करते थे। सैन्य व्यवस्था में गज, अश्व और पैदल सेना, जबकि राजस्व व्यवस्था में भूमिकर (भाग), भोग तथा अन्य करों का महत्वपूर्ण स्थान था। भूमि प्रशासन में केदार और सारी जैसी श्रेणियों तथा विभिन्न माप-पद्धतियों का प्रयोग मिलता है। प्रशासनिक पदों में गुप्त एवं हर्षकालीन व्यवस्था की समानता दिखाई देती है। पर्वतीय संसाधनों, व्यापार और कृषि से राज्य की आर्थिक स्थिति को आधार मिलता था। साथ ही बौद्ध एवं अन्य धार्मिक परंपराओं की सह-अस्तित्व की स्थिति पौरव शासकों की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाती है।

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