पौरव राजा एवं उनकी उपाधियाँ|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

पौरव वंश के शासकों के संबंध में मुख्य जानकारी तालेश्वर ताम्रपत्रों से प्राप्त होती है। इन अभिलेखों में पौरव वंश के कई शासकों के नाम तथा उनकी राजनीतिक स्थिति और उपाधियों का उल्लेख मिलता है। प्रारंभिक शासकों से लेकर बाद के शक्तिशाली नरेशों तक उनकी स्थिति में परिवर्तन दिखाई देता है। विशेष रूप से अग्निवर्मन, धुतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय द्वारा धारण की गई उच्च राजकीय उपाधियाँ पौरव सत्ता के क्रमिक सुदृढ़ीकरण एवं स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति की ओर संकेत करती हैं।

पौरव राजा व उनकी उपाधिया

  • ऐसा अनुमान लगाया गया है कि ब्रह्मपुर जनपद के अन्तर्गत पौरव वंश भी हर्ष के अधीन रहा होगा। हर्ष की मृत्यु के बाद की स्थिति का लाभ ब्रह्मपुर जनपद ने भी अवश्य उठाया होगा।
  • तालेश्वर ताम्रपत्रों में विष्णुवर्मन प्रथम, वृषवर्मन, श्री अग्निवर्मन, धुतिवर्मन व विष्णुवर्मन द्वितीय के नामों का उल्लेख मिलता है।
  • प्रारम्भिक पौरववंशीय शासकों के नामों का उल्लेख धुतिवर्मन के अभिलेख में हुआ है। ये प्रारम्भिक शासक विष्णुवर्मन प्रथम एवं वृषवर्मन हैं। इनकी किसी भी उपाधि का न होना प्रदर्शित करता है कि इनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होगा या सम्भवतः इन्होंने हर्ष की मृत्यु के तुरन्त पश्चात् अपने को स्वतन्त्र घोषित करने में हिचकिचाहट महसूस की हो भले ही पौरव वंश की नींव रख ली हो, ऐसा हर्ष के प्रति श्रद्धा या स्वामीभक्ति के कारण हो सकता है।
  • धुतिवर्मन के ताम्र अभिलेख में एक पौरववंशी शासक श्री अग्निवर्मन का नाम भी मिलता है। वह एक स्वतन्त्र शासक था। उसने परमभट्टारक महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। ऐसी उपाधियाँ छठी-सातवीं सदी में शक्तिशाली सामन्त ही रखा करते थे। वैसे भी क्षत्रिय शासकों के लिए यह उपाधि अपने आप में बहुत बड़ी एवं श्रेष्ठ उपाधि थी।
  • अग्निवर्मन के पश्चात् धुतिवर्मन पौरव वंश का शासक बना। वह अग्निवर्मन का पुत्र था। तालेश्वर अभिलेखों में एक अभिलेख धुतिवर्मन का भी प्राप्त हुआ है। वह एक शक्तिशाली शासक था। उसके अभिलेख से उसकी उपाधि महाधिराज परम भट्टारक का ज्ञान होता है। तालेश्वर अभिलेख में उसकी प्रशंसा की गयी है।
  • धुतिवर्मन के पश्चात् उसका पुत्र विष्णुवर्मन द्वितीय शासक बना। उसकी उपाधि अपने पिता की भाँति महाराजाधिराज परम भट्टारक की थी। विष्णुवर्मन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की सूचना नहीं मिलती है। सम्भवतः पौरव वंश का अन्त हो गया हो।
  • कन्नौज के शासक यशोवर्मा द्वारा जब हिमालय की घाटियों में अपना सैनिक अभियान किया गया था तब पौरव वंश का कोई अस्तित्व वहाँ नहीं था। यदि वहाँ होगा भी तो उसका अन्त कर दिया गया होगा।
  • प्रमुख उपाधिया – महाराजाधिराज परम भट्टारक, गौ ब्राह्मण हितैषी, श्री (श्री अग्निवर्मन)

निष्कर्ष

पौरव शासकों की उपाधियों से उनके राजनीतिक विकास और स्वतंत्रता की क्रमिक प्रक्रिया का संकेत मिलता है। प्रारंभिक शासक विष्णुवर्मन प्रथम और वृषवर्मन बिना किसी प्रमुख उपाधि के मिलते हैं, जबकि बाद में अग्निवर्मन, धुतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय ने उच्च राजकीय उपाधियाँ धारण कीं। विशेषतः परमभट्टारक महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ पौरव सत्ता के सुदृढ़ होने को दर्शाती हैं। विष्णुवर्मन द्वितीय के बाद वंश के संबंध में प्रमाणों का अभाव और यशोवर्मा के हिमालयी अभियान से संकेत मिलता है कि 8वीं शताब्दी के आसपास पौरव सत्ता का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया होगा।

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