पौरव वंश : शासनकाल एवं राज्य सीमा |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

पौरव अथवा पर्वताकार वंश उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसका प्रमुख केंद्र ब्रह्मपुर माना जाता है। इस वंश के शासनकाल और राज्य-विस्तार के संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इतिहासकारों ने तालेश्वर ताम्रपत्रों, समकालीन राजनीतिक घटनाओं तथा ह्वेनसांग के विवरण के आधार पर इसके काल एवं सीमा का निर्धारण करने का प्रयास किया है। उपलब्ध साक्ष्यों से पौरव सत्ता का संबंध उत्तराखण्ड के विस्तृत पर्वतीय भू-भाग से जोड़ा जाता है और इसे कत्यूरी सत्ता के उदय से पूर्व की महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति माना जाता है।

पौरव वंश का शासनकाल

  • पौरव वंश के शासनकाल के संबंध में स्पष्ट एवं सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
  • तालेश्वर से प्राप्त अभिलेखों के आधार पर इनके संपादक वाई. आर. गुप्ते ने इन्हें लगभग 6वीं से 8वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य का माना है।
  • इसी आधार पर पौरव वंश का शासनकाल लगभग 6वीं–8वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माना जाता है।
  • इतिहासकार डी. सी. सरकार ने भी पौरव वंश को 6वीं शताब्दी ईस्वी से संबंधित माना है।
  • सामान्यतः यह माना जाता है कि पौरव वंश का उद्भव हर्षवर्धन के पश्चात् तथा कन्नौज के यशोवर्मा और कत्यूरी सत्ता के सुदृढ़ होने से पूर्व हुआ।
  • हर्षवर्धन का शासन लगभग 606–647 ईस्वी माना जाता है, जबकि कन्नौज के यशोवर्मा का काल लगभग 8वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से संबंधित माना जाता है।
  • विष्णुवर्मन द्वितीय के तालेश्वर अभिलेख से भी पौरव सत्ता को हर्ष के परवर्ती काल से जोड़ने का आधार मिलता है।
  • पौरव वंश को कत्यूरी वंश का पूर्ववर्ती मानने का एक आधार तालेश्वर ताम्रपत्रों में कार्तिकेयपुर के उल्लेख को माना जाता है।

पौरव वंश की राज्य सीमा

  • इतिहासकार कनिंघम के मतानुसार ब्रह्मपुर राज्य का विस्तार अलकनंदा और करनाली नदियों के मध्य स्थित पर्वतीय प्रदेश तक था।
  • इस क्षेत्र में वर्तमान गढ़वाल एवं कुमाऊँ का विस्तृत भू-भाग सम्मिलित माना गया है।
  • इस आधार पर पौरव वंश की राजनीतिक सत्ता का विस्तार उत्तराखण्ड के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों तक माना जाता है।
  • पौरव राज्य का प्रमुख केंद्र ब्रह्मपुर था।
  • राज्य की भौगोलिक स्थिति पर्वतीय होने के कारण इसे ‘पर्वताकार राज्य’ कहे जाने की संभावना व्यक्त की जाती है।
  • पौरव सत्ता के प्रभाव क्षेत्र में भावर के कुछ मैदानी क्षेत्र भी सम्मिलित रहे होने की संभावना मानी जाती है।
  • इस प्रकार पौरव राज्य का क्षेत्र हिमालयी पर्वतीय भू-भाग और उससे लगे तराई-भावर क्षेत्रों तक विस्तृत माना जा सकता है।

निष्कर्ष

पौरव वंश के शासनकाल और राज्य-सीमा का निर्धारण उपलब्ध सीमित साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है। वाई. आर. गुप्ते के अनुसार इसका काल लगभग 6वीं से 8वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य माना जा सकता है, जबकि अन्य विद्वानों ने इसे मुख्यतः 6वीं शताब्दी से जोड़ा है। राज्य-विस्तार की दृष्टि से ब्रह्मपुर केंद्रित पौरव सत्ता को वर्तमान गढ़वाल-कुमाऊँ के विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र तथा भावर तक प्रभावी माना गया है। इस प्रकार पौरव वंश उत्तराखण्ड में हर्षोत्तर और कत्यूरी-पूर्व राजनीतिक संक्रमण को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है।

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