उत्तराखण्ड में नाग वंश|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
नाग वंश उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में उत्तर-गुप्तकाल के बाद उभरने वाली महत्वपूर्ण स्थानीय राजसत्ताओं में से एक था। लगभग 6वीं–7वीं शती ईस्वी में उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में नाग शक्ति के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। इनके इतिहास का प्रमुख आधार गोपेश्वर का त्रिशूल लेख तथा उत्तरकाशी के बाड़ाहाट शक्ति-स्तंभ अभिलेख हैं। गोपेश्वर अभिलेख में नाग शासकों की क्रमिक वंशावली प्राप्त होती है, जिससे इस क्षेत्र में नागों की राजनीतिक उपस्थिति का प्रमाण मिलता है।
उत्तराखण्ड में नाग वंश-प्रमुख बिंदु
- उत्तराखण्ड में लगभग 6वीं–7वीं शती ईस्वी में नाग वंश के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं।
- नागों के इतिहास की प्रमुख पुष्टि गोपेश्वर के त्रिशूल लेख से होती है।
- गोपेश्वर त्रिशूल लेख में क्रमागत चार नाग राजाओं के नाम मिलते हैं
- स्कन्दनाग
- गणपतिनाग
- विभुनाग
- अंशुनाग
- त्रिशूल लेख के अनुसार गणपतिनाग ने अपने दूसरे राज्य-वर्ष में रुद्रमहालय के सामने एक शक्ति (त्रिशूल) की स्थापना कराई थी।
- गोपेश्वर का त्रिशूल लेख दक्षिणी ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है, जिसे सामान्यतः 6वीं–7वीं शती ईस्वी से संबंधित माना जाता है।
- उत्तरकाशी के बाड़ाहाट शक्ति-स्तंभ अभिलेख से गणेश्वर नामक राजा की जानकारी मिलती है। हालांकि, गणेश्वर के नागवंशी होने की पुष्टि अभी निश्चित रूप से नहीं हुई है।
- गणपतिनाग उत्तरी नागवंश का एक शक्तिशाली शासक प्रतीत होता है। उसका अभिलेख रुद्रमहालय, गोपेश्वर से प्राप्त हुआ है।
- नागों की सत्ता का प्रभाव उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय एवं यमुना घाटी के क्षेत्रों तक रहा माना जाता है।
- एक मत के अनुसार यमुना घाटी में यदु/यादव सत्ता के पतन और नाग शक्ति के उदय में नागों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- नाग वंश के अभिलेख उत्तराखण्ड में उत्तर-गुप्तकालीन स्थानीय राजसत्ताओं के विकास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- नाग शासकों के अभिलेखों से उनके धार्मिक विश्वासों तथा शैव परंपरा से संबंध का भी संकेत मिलता है।
- त्रिशूल की स्थापना से स्पष्ट होता है कि इस काल में शैव धार्मिक परंपरा को राजकीय संरक्षण प्राप्त था।
निष्कर्ष
उत्तराखण्ड का नाग वंश उत्तर-गुप्तकालीन राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। गोपेश्वर का त्रिशूल लेख इसके इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रमाण है, जिसमें स्कन्दनाग, गणपतिनाग, विभुनाग और अंशुनाग जैसे शासकों की जानकारी मिलती है। गणपतिनाग द्वारा रुद्रमहालय के सामने त्रिशूल की स्थापना नागों के शैव धार्मिक संबंधों को स्पष्ट करती है। बाड़ाहाट अभिलेख भी इस काल की राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालता है। इस प्रकार नागों ने उत्तराखण्ड में स्थानीय राजसत्ता के विकास तथा यमुना घाटी की राजनीतिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।