पौराणिक व वैदिक काल मे उत्तराखण्ड का कुमाऊँ क्षेत्र|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
उत्तराखण्ड का कुमाऊँ क्षेत्र प्राचीन काल से ही धार्मिक, पौराणिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं में इसे मुख्यतः मानसखण्ड और कुर्मांचल के नाम से जाना जाता था। इसकी पहचान हिमालयी भू-भाग, कैलाश-मानसरोवर की धार्मिक परंपरा तथा अनेक प्राचीन तीर्थों और जनजातीय समुदायों से जुड़ी रही है। पुराणों और महाभारत में यहाँ किरात, खस, नाग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व एवं विद्याधर जैसी विभिन्न जातियों के निवास का उल्लेख मिलता है। जागेश्वर, बीनाग/बेरीनाग और चम्पावत जैसे स्थल इसकी प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। इस प्रकार कुमाऊँ क्षेत्र की प्राचीनता केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित न होकर इसकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भी दिखाई देती है।
मुख्य तथ्य
- कुमाऊँ क्षेत्र का प्राचीन नाम मानसखण्ड व कुर्मांचल था। पौराणिक कथाओं के अनुसार चम्पावत के कांतेश्वर पर्वत पर भगवान विष्णु का कूर्मा या कच्छपावतार हुआ था और कांतेश्वर पर्वत के नाम पर मानसखण्ड के इस क्षेत्र को कुर्मांचल कहा गया। कुर्मांचल संस्कृत नाम आगे चलकर प्राकृत में कुमू और हिन्दी में कुमाऊँ हुआ।
- कुर्मांचल का सर्वप्रथम अभिलेखीय उल्लेख कल्याणचंद के चम्पावत स्थित नागनाथ मंदिर शिलालेख में मिलता है।
- चंद शासक रुद्रचंद के नाटक उषारागोदय में कूर्मागिरी शब्द का उल्लेख कुमाऊँ के लिए मिलता है।
- कुमाऊँ शब्द का प्रथम प्रयोग विक्रमचंद द्वारा देशटदेव ताम्रपत्र में किया गया है, जिसमें बालेश्वर मंदिर भूमिदान का उल्लेख मिलता है।
- स्कन्दपुराण के मानसखण्ड का प्रारम्भ राजा जनमेजय तथा सूत पौराणिक के बीच संवाद से होता है।
- ब्रह्म व वायुपुराण के अनुसार कुमाऊँ क्षेत्र में किरात, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, नाग एवं विद्याधर जातियाँ निवास करती थीं।
- महाभारत से किरात, किन्नर, यक्ष, तंगव, कुलिंद तथा खस जातियों के निवास की पुष्टि करता है।
- अल्मोड़ा का जाखन देवी का मंदिर इस क्षेत्र में यक्षों के निवास की पुष्टि करता है।
- कुमाऊँ क्षेत्र में बीनाग या बेरीनाग, काली नाग, पिंगलनाग, वासुकी नाग आदि मंदिर नाग जाति के निवास की पुष्टि करते हैं।
- नाग मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध बीनाग या बेरीनाग मंदिर, पिथौरागढ़ में स्थित है।
- मानसखण्ड के अनुसार जागेश्वर धाम में भगवान शिव ने तपस्या की और कार्तिकेय का जन्म यहीं पर हुआ था।
- महाभारत के वन पर्व के अनुसार ऋषि धौम्या/धौम्य सम्राट युधिष्ठिर को भारत के तीर्थ स्थलों के बारे में बताते हैं।
- पुरुषोत्तम सिंह के बोधगया अभिलेख में कुमाऊँ के लिए कामादेश कहा गया है।
- रामायण काल में कुमाऊँ क्षेत्र को उत्तर कौशल भी कहा जाता था।
- चम्पावत में एक घटोत्कच देवता (घटोत्कच) का मंदिर है, जिस टीले पर यह मंदिर स्थित है, उसे ही स्कन्दपुराण में कूर्मांचल माना जाता है।
- किरातों के वंशज आज भी अस्कोट एवं डीडीहाट क्षेत्रों में निवास करते हैं।इन्होंने अपना स्वतंत्र भाषाई अस्तित्व बनाया हुआ है। इनकी भाषा “मुंडा” है।
- बाद की कुमाऊ की जातियों मे खस का उल्लेख मिलता है जो कि बहुत सशक्त थी,इस क्षेत्र में भी खसकाल में ही बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। कुमाऊँ क्षेत्र पर राजपूत नियंत्रण से पूर्व तक खस जाति का आधिपत्य बना रहा।
निष्कर्ष
इस प्रकार मानसखण्ड अथवा कुर्मांचल के रूप में कुमाऊँ क्षेत्र ने उत्तराखण्ड की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैदिक-पौराणिक परंपराओं, विभिन्न जनजातीय समुदायों, नाग एवं शिव उपासना तथा प्राचीन तीर्थस्थलों ने इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को विकसित किया। खसों के प्रभाव और बौद्ध धर्म के प्रसार ने भी क्षेत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को प्रभावित किया। जागेश्वर जैसे धार्मिक केंद्र और चम्पावत-कूर्मांचल से जुड़ी परंपराएँ आज भी इसकी प्राचीन विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। अतः कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास धर्म, लोकपरंपरा, जनजातीय संस्कृति और हिमालयी सभ्यता के समन्वय को समझने का महत्वपूर्ण आधार है।