ताम्र निखात संस्कृति (Copper Hoard Culture)|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास में ताम्र निखात संस्कृति (Copper Hoard Culture) का विशेष महत्व है। इसे सामान्यतः ऊपरी गंगा घाटी की प्राचीनतम सांस्कृतिक परंपराओं में से एक माना जाता है, जिसके प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य ताम्र से निर्मित विभिन्न उपकरणों के रूप में प्राप्त हुए हैं। उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि राज्य का तराई-भाबर एवं पाद-प्रदेश क्षेत्र ऊपरी गंगा घाटी की सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है, जबकि मध्य हिमालय में तांबे के संसाधनों की उपलब्धता ने धातु-आधारित संस्कृति के विकास की संभावनाएँ उत्पन्न कीं। हरिद्वार के बहादराबाद से प्राप्त ताम्र उपकरण एवं मृदभांड इस संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के बनकोट तथा नैनीपातल आदि क्षेत्रों से प्राप्त ताम्र उपकरण उत्तराखंड में ताम्र-प्रयोग एवं प्राचीन धातु संस्कृति के प्रसार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ताम्र निखात संस्कृति प्रमुख विशेषताये व तथ्य
- ताम्र निखात संस्कृति ऊपरी गंगा घाटी की प्राचीनतम संस्कृति हैं। इस घाटी में ताम्र उपकरण फतेहगढ़, बिठूर,बिसौली,शिवराजपुर आदि स्थलों से प्राप्त हो चुके हैं|
- उत्तराखंड मे हरिद्वार के बहादराबाद में ताम्र उपकरण एवं मृदभांड की खोज 1951 में नहर की खुदाई के दौरान हुई, इसे ताम्र निखात संस्कृति से संबंधित माना जाता है|
- हरिद्वार की बहरादाबाद से भल्लाग्र, वासियों चूड़ियां एवं कडो के रूप में प्राप्त प्रागैतिहासिक काल के ताम्र उपकरण प्राप्त हुए । इन उकरणों के साथ गैरिक भांड के सदृश लोहित मृदभांड भी प्राप्त हुए।
- 1953 को यज्ञदत्त शर्मा ने बहादराबाद से पाषाण उपकरणों एवं लोहित मृदभांडों की खोज की थी, पुराविदों ने इन्हें क्रमशः किसी ताम्रयुगीन एवं उत्तर प्रस्तरयुगीन बस्ती के अवशेष माना है।
- यज्ञदत्त शर्मा के अनुसार बहादराबाद मृदभांड लोहित एवं मोटे हैं तथा पर्याप्त पकाए नहीं गए है जिनकी तुलना हस्तिनापुर के गैरिक मृदभांडो से की गई है
- बहादराबाद के अतिरिक्त, उत्तराखण्ड के पाद-प्रदेश में ही नसीरपुर, अम्बखेड़ी (सहारनपुर ज.) तथा राजपुर परसु (बिजनौर ज.) से भी ताम्र-निखात संस्कृति की खोज हो चुकी है।
- नसीरपुर से प्राप्त कुठार, हारपून, शलाका (bars) तथा भल्लाग्र (लान्सहेड्स) गुरुकुल काँगड़ी संग्रहालय, हरिद्वार में संग्रहीत हैं।
- 1986 में अल्मोड़ा से एक ताम्र उपकरण प्राप्त हुई है
- 1989 में पिथौरागढ़ के बनकोट से आठ ताम्र उपकरण प्राप्त हुई है।
- बनकोट के ताम्र उपकरण अब अल्मोड़ा राजकीय संग्रहालय में संरक्षित हैं।
- 1999 में नैनीपातल पिथौरागढ़ से पांच ताम्र उपकरण प्राप्त हुई है।
- आल्चिन ने इस उपकरण को ‘यज्ञीय कुठार’ तथा मो०प्र० जोशी ने इन्हें अनुष्ठान में प्रयुक्त ‘परशु-पुरुष’ (Personified Axe) माना था।परन्तु डॉ० पी० सी० शर्मा अपने एक शोधपत्र (1967) में इन्हें मानवाकृति (anthropomorphs) नहीं मानते,प्रत्युत ताम्र-उपकरण संस्कृति के नये ‘स्कन्धित कुठार’ मानते हैं
- बनकोट व बहादराबाद ताम्र उपकरणों पर पुराविदों का मानना है कि ताम्र संस्कृति निर्माताओं को ताम्र- आपूर्ति गढ़वाल- कुमाऊं में स्थित पोखरी,धनपुर- डोबरी, अस्कोट आदि खानों से हुई,प्राचीन काल में आगरी जाति खनन कार्य से संबंधित कार्य करती थी।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में प्राप्त ताम्र उपकरण राज्य के प्राचीन इतिहास में धातु-प्रयोग, सांस्कृतिक संपर्क और संसाधनों के उपयोग की परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। बहादराबाद से प्राप्त ताम्र उपकरणों के साथ लोहित मृदभांड तथा पाषाण उपकरणों की प्राप्ति इस क्षेत्र की प्राचीन बस्तियों और सांस्कृतिक विकास की जटिलता को दर्शाती है। वहीं बनकोट और नैनीपातल जैसे पिथौरागढ़ के स्थलों से प्राप्त ताम्र उपकरण हिमालयी क्षेत्र में ताम्र संस्कृति की उपस्थिति को स्पष्ट करते हैं। इन उपकरणों के स्वरूप एवं उपयोग को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत रहे हैं—कुछ ने इन्हें यज्ञीय या अनुष्ठानिक उपकरण माना, जबकि अन्य ने इन्हें विशिष्ट ताम्र उपकरणों की श्रेणी में रखा। इनके साथ पोखरी, धनपुर-डोबरी और अस्कोट जैसी तांबे की खानों को जोड़कर देखा जाना उत्तराखंड में प्राचीन खनन एवं धातुकर्म परंपरा के महत्व को और स्पष्ट करता है।