कुली बेगार आंदोलन (1921)
परिचय
कुली बेगार आंदोलन उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण जनांदोलन था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्थानीय लोगों से कराए जाने वाले बेगार श्रम का विरोध करना था। इस प्रथा के अंतर्गत ग्रामीणों को बिना पारिश्रमिक अधिकारियों का सामान ढोना, खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना और डाक पहुँचाने जैसे कार्य करने पड़ते थे। कुमाऊँ में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल के नेतृत्व में यह आंदोलन व्यापक जनांदोलन बना। जनवरी 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के दौरान हजारों लोगों ने बेगार न देने की शपथ ली और बेगार संबंधी रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनएकता का परिचय दिया।
कुली बेगार के प्रकार
- कुली बेगार- जब कोई ब्रिटिश अधिकारी एक गांव से दूसरे गांव भ्रमण पर जाता था तो वहां के लोगों को बिना पैसे के सामान एक गांव से दूसरे गांव पहुंचना होता था। इस गोली बेकार कहा जाता था.
- कुली उतार- जब गांव के लोग सड़कों पर उतरकर कुली का काम करते थे इसे कुली उतार कहा जाता था।
- कुली बर्दायश – जिस गांव में ब्रिटिश अधिकारी रात को विश्राम करते थे ,उस गांव के लोगों को ब्रिटिश अधिकारी के लिए खाद्य सामग्री की व्यवस्था करनी होती थी।
- हलक बेगार – यह भी बेगार मजदूरी का हिस्सा था।इसमें डाक पहुंचाए जाने के लिए बारी – बारी से ग्रामीणों को बिना भुगतान के कार्य करना पड़ता था.
कुली एजेंसियां
- इस एजेंसी के अंतर्गत कुली बेगार देने के जिम्मेदार परिवार से बेगार के बदले एक निश्चित धनराशि प्रति माह ली जाती थी, इस धनराशि के द्वारा स्थाई कुलियों की व्यवस्था की जाती थी।
- कुली एजेंसी का सर्वप्रथम विचार गिरिजादत्त नैथाणी का था। कुली एजेंसी के निर्माण में तारा दत्त गैरोला का योगदान सर्वाधिक था।
- कुली एजेंसी को ‘ट्रांसपोर्ट एंड सप्लाई कोऑपरेटिव एसोसिएशन ‘के नाम से भी जाना जाता.
- प्रथम कुली एजेंसी जोध सिंह नेगी द्वारा 1908 में स्थापित की गई। इसका मुख्यालय पौड़ी में था ।
- 1912 में लैंसडाउन में कुली एजेंसी की स्थापना की हुई.
- 1913 में रुद्रप्रयाग में कुली एजेंसी की स्थापना हुई।
कुली बेगार के विरोध का इतिहास
- 1822 में ग्लिन नामक अंग्रेज अधिकारी नें ट्रेल को खच्चर सेना गठित करने को सुझाव दिया। ग्लिन के सुझाव पर 1822 में ट्रेल ने खच्चर सेना का गठन किया।
- 1840 में लोहाघाट में सर्वप्रथम कुली बेगार विरोध किया गया।
- कुमाऊं कमिश्नर हैनरी रेमजे के काल में सोमेश्वर घाटी के कृषकों ने कुली बेगार देने से इनकार कर दिया तब हैनरी रेमजे द्वारा इन पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
- 1903 में अल्मोड़ा के ग्राम खत्याडी के ग्रामीणों द्वारा कुली बेगार देने से इनकार कर दिया गया। इस पर उन्हें प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा दंडित किया गया।
- उन्होंने इसके विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील कर दी जिसमें उनकी विजय हुई। 1904 में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा कुली बेगार को अवैध घोषित किया गया।
- 14 जुलाई 1913 अल्मोड़ा अखबार के संपादक बद्रीदत्त पांडे ने कुली बेगार व जंगलात विरोधी कानून के विरोध में एक लेख छापा जिसमें बताया कि जंगलात कानून हमारी आर्थिक गतिविधियों पर असर करता है लेकिन बेगार प्रथा हमें मानसिक रूप से पीड़ित करती हैं।
कुली बेगार आंदोलन का प्रारंभ
- 1920 में कुमाऊं परिषद के चौथे अधिवेशन में हरगोविंद पंत की अध्यक्षता में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया।
- 1920 में बद्रीदत्त पांडे ने कोलकाता जाकर गांधी जी से मुलाकात की व कुली बेगार से अवगत कराया।
- 1 जनवरी 1921 को कत्यूर के चामी गांव के हरु मंदिर में 400 लोगों ने एक साथ बेगार न देने की शपथ ली।
- 10 जनवरी 1921 को बागेश्वर में कुली बेगार के विरोध में भीड़ जमा होने लगी।
- अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल ने भीड़ पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
- 13-14 जनवरी 1921 को 40 हज़ार लोगों ने बद्रीदत्त पांडे,हरगोविंद पपंत,चिरंजी लाल के नेतृत्व में बागनाथ मंदिर की पूजा अर्चना की वह उसके बाद जुलूस निकाला।
- जुलूस के सबसे आगे झंडे पर लिखा था कुली बेगार बंद करो।
- अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल ने भीड़ पर गोली दागनी चाही लेकिन भीड़ अधिक देखकर वह डर गया।
- इसके बाद सरयू मैदान पर एक सभा होती है इस सभा को संबोधित कर बद्रीदत्त पांडे ने कहा पवित्र सरयू का जल व बागनाथ मंदिर को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करो कि आज से कुली उतार, कुली बेगार, कुली बर्दाश्य नहीं देंगे।
- 13-14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में सरयू नदी के किनारे उत्तरायणी मेले में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत व चिरंजीलाल के नेतृत्व में लगभग चालीस हज़ार आंदोलनकारी ने बेगार न देने का संकल्प लिया।
- सभी मुखियो व ग्राम प्रधानों ने बेगार संबंधी रजिस्टर सरयू में बहा दिया।
- इसी आंदोलन के पश्चात बद्रीदत्त पांडे को ‘कुमाऊं केसरी’की उपाधि दी गई
गढ़वाल में कुली बेगार आंदोलन
- आंदोलन के प्रभाव से गढ़वाल जिला भी न बच सका।30 जनवरी 1921 में चमेठाखाल नामक स्थान पर मुकुंदीलाल के नेतृत्व में एक विशाल सभा हुई तथा उन्होंने लोगों को बागेश्वर घटना का समर्थन करने को कहा। इससे संपूर्ण गढ़वाल में आंदोलन की आग फैलने लगी।
- मुकंदी लाल की भांति अनुसूया प्रसाद बहुगुणा भी गांव-गांव जाकर आंदोलन का प्रचार प्रसार करने में व्यस्त थे।
अन्य तथ्य
- उत्तराखंड में कुली बेगार प्रथा पुस्तक के लेखक- डॉ शेखर पाठक
- यंग इंडिया में महात्मा गांधी ने कुली बेगार आंदोलन को “रक्तहीन क्रांति” कहा।
- स्वामी सत्यदेव ने उत्तराखंड के कुली बेगार विरोधी आंदोलन को असहयोग आंदोलन की प्रथम ईट कहां।
- कुली बेगार की जांच के लिए गठित समिति- विंढम समिति, 1918
- सल्ट क्षेत्र में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने का श्रेय पंडित हरगोविंद पंत को जाता है, फलतः इन्हें सल्ट का राजनीतिक गुरु भी स्वीकार किया जाता है।
- 1895 में अल्मोड़ा अखबार द्वारा एक कथन प्रकाशित किया गया, आज हमारे शरीर के प्रत्येक अंग पर कर लग गया है।
- कुली बेगार आंदोलन के दौरान मार्च 1921 में मनमोहन सिंह मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया,यह ब्रिटिश कालीन कुमाऊं कमिश्नरी के स्वतंत्रता सेनानियों की प्रथम राजनीतिक गिरफ्तारी थी। इस गिरफ्तारी में उन्हें 9 माह के कठोर कारावास की सजा हुई तथा 100 रुपया जुर्माना हुआ.
- दिसंबर 1921 में गढ़वाल कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं की दुगड्डा में आयोजित बैठक की अध्यक्षता पुरुषोत्तम दास टंडन ने की, जिसमें कुली बेगार न दिये जाने की मांग दोहराई गयी ।
निष्कर्ष
कुली बेगार आंदोलन उत्तराखंड में अन्यायपूर्ण श्रम-व्यवस्था के विरुद्ध संगठित जनप्रतिरोध का ऐतिहासिक उदाहरण था। बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में हजारों लोगों द्वारा बेगार न देने की शपथ लेना इस संघर्ष का निर्णायक प्रतीक बना। बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल, मुकुन्दीलाल और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जैसे नेताओं ने आंदोलन को व्यापक आधार दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनएकता को मजबूत किया और उत्तराखंड के राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।