सुगौली की संधि (1815–1816)

परिचय

सुगौली की संधि आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई एक महत्वपूर्ण संधि थी। आंग्ल-गोरखा युद्ध में गोरखों की पराजय के बाद उन्हें अंग्रेजों के साथ समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 ई. को प्रारंभिक संधि हुई, लेकिन नेपाल सरकार ने तत्काल इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद अंग्रेजों ने मकवानपुर के निकट गोरखा सेना को पराजित किया, जिसके दबाव में नेपाल ने 4 मार्च 1816 ई. को संधि को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। इस संधि ने अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध को समाप्त किया तथा हिमालयी क्षेत्र में दोनों शक्तियों के संबंधों को एक नया राजनीतिक स्वरूप प्रदान किया।

सुगौली की संधि प्रमुख तथ्य

  • आंग्ल-गोरखा युद्ध में पराजय के बाद गोरखा सेनापतियों को अंग्रेजों के साथ संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।
  • सुगौली की संधि का प्रारंभिक समझौता 2 दिसंबर 1815 ई. को हुआ।
  • यह संधि सुगौली (चंपारण क्षेत्र, बिहार) में हुई थी।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैडशॉ तथा नेपाल के महाराज गीर्वाण युद्ध विक्रम शाह की ओर से गुरु गजराज मिश्र और चंद्रशेखर उपाध्याय ने संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • नेपाल सरकार ने प्रारंभ में इस संधि को स्वीकार नहीं किया।
  • संधि की स्वीकृति न मिलने पर 28 फरवरी 1816 ई. को मेजर जनरल ऑक्टरलोनी ने काठमांडू से कुछ दूरी पर स्थित मकवानपुर के निकट गोरखा सेना पर आक्रमण किया और उसे पराजित किया।
  • गोरखा सेना की पराजय और अंग्रेजों के सैन्य दबाव के बाद नेपाल सरकार ने 4 मार्च 1816 ई. को सुगौली की संधि को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
  • संधि के बाद दोनों पक्षों ने युद्ध समाप्त करने की घोषणा की।
  • पूर्व में हुई व्यवस्था के अंतर्गत अंग्रेजों को दिए गए तराई के कुछ प्रदेश नेपाल को वापस कर दिए गए।
  • अवध की सीमा से लगे तराई क्षेत्र को अवध को दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
  • मंची नदी और तीस्ता नदी के मध्य की पट्टी सिक्किम के राजा को सौंप दी गई।
  • व्यास नदी के निकट टिंकर और छाँगरु जैसे क्षेत्रों को नेपाल को वापस दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • 2 दिसंबर 1815 ई. को गजराज मिश्र के साथ हुई प्रारंभिक संधि की शर्तों की पुष्टि नेपाल के राजा ने की।
  • संधि की एक महत्वपूर्ण शर्त के अंतर्गत नेपाल में ब्रिटिश रेजिडेंट रखने को स्वीकार किया गया।
  • अंग्रेजों ने भी गोरखों को अपनी सेना में भर्ती करने की अनुमति दी। आगे चलकर गोरखा सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना की महत्वपूर्ण सैन्य परंपरा का हिस्सा बने।
  • सुगौली की संधि ने अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध को समाप्त कर स्थायी शांति की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया।
  • संधि के परिणामस्वरूप नेपाल के पश्चिमी विस्तार पर रोक लगी और ईस्ट इंडिया कंपनी का हिमालयी क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव बढ़ा।
  • उत्तराखंड के इतिहास की दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। आंग्ल-गोरखा युद्ध की समाप्ति के बाद कुमाऊँ और गढ़वाल से गोरखा शासन का अंत हुआ और इन क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन की स्थापना हुई।
  • संधि के बाद अंग्रेजों को हिमालयी क्षेत्र के माध्यम से तिब्बत और मध्य एशिया के साथ व्यापारिक संभावनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर मिला।
  • गोरखा सैनिकों की वीरता और युद्ध-कौशल से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती किया। आगे चलकर गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में अपनी वीरता और सैन्य अनुशासन की विशिष्ट पहचान बनाई।

निष्कर्ष

सुगौली की संधि 1815–1816 ई. के आंग्ल-गोरखा युद्ध का निर्णायक परिणाम थी। 2 दिसंबर 1815 को हुई प्रारंभिक संधि को नेपाल द्वारा स्वीकार न किए जाने के बाद मकवानपुर में गोरखों की पराजय ने नेपाल को समझौता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। अंततः 4 मार्च 1816 ई. को संधि की औपचारिक स्वीकृति के साथ आंग्ल-गोरखा युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि ने नेपाल के विस्तार को सीमित किया और हिमालयी क्षेत्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति मजबूत की। उत्तराखंड के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम गोरखा शासन का अंत और ब्रिटिश शासन की स्थापना था। साथ ही, गोरखा सैनिकों की सैन्य क्षमता को पहचानते हुए अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती किया, जिससे आगे चलकर गोरखा सैनिकों की एक विशिष्ट सैन्य परंपरा विकसित हुई।

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