कुमाऊँ परिषद (1916–1926)
परिचय
कुमाऊँ परिषद उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण संगठन था, जिसने क्षेत्रीय समस्याओं को संगठित रूप से उठाने और जनता में राजनीतिक चेतना विकसित करने में भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के दौरान कुली बेगार, वन संबंधी प्रतिबंधों तथा सामाजिक और शैक्षिक समस्याओं से जूझ रहे पर्वतीय क्षेत्र में एक प्रभावी राजनीतिक मंच की आवश्यकता महसूस की गई। इसी उद्देश्य से 1916 में कुमाऊँ परिषद की स्थापना हुई। इस संगठन ने अपने विभिन्न अधिवेशनों के माध्यम से क्षेत्रीय मुद्दों को उठाया और राष्ट्रीय आंदोलन के साथ कुमाऊँ के संबंधों को मजबूत किया।
प्रमुख तथ्य
- कुमाऊँ परिषद की स्थापना की प्रारंभिक कल्पना 31 मार्च 1908 के अल्मोड़ा अखबार के अंक में व्यक्त की गई थी। इसमें पर्वतीय क्षेत्र की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों में सुधार के लिए एक संगठन की आवश्यकता बताई गई थी।
- 28 मई 1911 के इलाहाबाद के समाचार-पत्र लीडर के अंक में बद्रीदत्त पांडे ने उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन के अभाव का उल्लेख किया।
- कुमाऊँ परिषद की स्थापना 30 सितंबर 1916 को नैनीताल में हुई।
- इसकी स्थापना में हरगोविंद पंत, गोविंद बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पांडे, इंद्रलाल साह, मोहन सिंह दरमवाल, चंद्रलाल साह, प्रेम बल्लभ पांडे, विक्टर मोहन जोशी तथा लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि का योगदान था।
- कुमाऊँ परिषद के गठन की रूपरेखा गोविंद बल्लभ पंत के नैनीताल स्थित नया बाजार के मकान में तैयार की गई थी।
- परिषद का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा शिक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान करना था।
- कुमाऊँ परिषद को कुमाऊँ की कांग्रेस भी कहा जाता था।
- वर्ष 1916 से 1926 के बीच कुमाऊँ परिषद के छह अधिवेशन आयोजित हुए, जिनमें विभिन्न क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की गई।
- 1926 में कुमाऊँ परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कर दिया गया।
निष्कर्ष
कुमाऊँ परिषद ने 1916 से 1926 के बीच क्षेत्रीय समस्याओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया। इसने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और प्रशासनिक प्रश्नों को उठाकर जनता की सामूहिक आवाज को मजबूत किया। विभिन्न अधिवेशनों के माध्यम से परिषद ने कुमाऊँ में राजनीतिक जागरूकता के विकास तथा राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।