राजा प्रदीप शाह भाग -2
- प्रदीप शाह के प्रमुख अधिकारियों में दीवान रघुपति चौथ्या, वजीर रंगी बिष्ट और चंद्रमणि डंगवाल तथा बक्शी विद्याधर डोभाल और आनंद सिंह के नाम मिलते हैं।
- प्रदीप शाह के दीवान रघुपति चौथ्या द्वारा सबलीगढ़ के निर्माण का उल्लेख मिलता है।
- प्रदीप शाह ने चार गाँव—धामूवाला, भूपतवाला, पंडितवाड़ी और मियाँवाला—गुरुद्वारा को दान दिए थे।
- प्रदीप शाह के शासनकाल में गढ़वाल-चंद संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। लंबे समय की शत्रुता के बाद दोनों राज्यों ने कई अवसरों पर एक-दूसरे को राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान की।
- प्रदीप शाह के शासनकाल में भारत के इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएँ भी हुईं। इनमें तीसरा पानीपत युद्ध (1761), प्लासी का युद्ध (1757) और बक्सर का युद्ध (1764) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
- प्रदीप शाह की मृत्यु लकवाग्रस्त होने के कारण हुई थी। परीक्षा की दृष्टि से प्रश्न पूछा जा सकता है—“किस पंवार शासक की मृत्यु लकवे के कारण हुई?” — प्रदीप शाह।
- प्रदीप शाह के शासनकाल में साहित्य और कला को विशेष संरक्षण मिला। मेधाकर शर्मा का रामायण प्रदीप और मौलाराम का चित्रांकन इस सांस्कृतिक संरक्षण के प्रमुख उदाहरण हैं।
- प्रदीप शाह के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि चंद-पंवार संबंध केवल युद्ध तक सीमित न रहकर कूटनीतिक एवं मैत्रीपूर्ण संबंधों में परिवर्तित हुए। दूतों, प्रतिनिधियों, विवाह समारोहों, उपहारों और सैन्य सहयोग ने दोनों राज्यों के संबंधों को नई दिशा दी।
निष्कर्ष
प्रदीप शाह का शासनकाल पंवार वंश के इतिहास में राजनीतिक परिवर्तन और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण काल था। अल्पायु में गद्दी पर बैठने के कारण प्रारंभ में उनकी माता जीया कनक देई ने शासन संभाला, किंतु 1729–30 ई. के बाद प्रदीप शाह ने स्वयं सत्ता ग्रहण की। उनके काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में चंद-पंवार संबंधों में शत्रुता के स्थान पर मित्रता का विकास था। रोहिलों के विरुद्ध कुमाऊँ को सहायता देना तथा दूनागिरी में संयुक्त संघर्ष इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। यद्यपि दून क्षेत्र पर नजीबुद्दौला के अधिकार जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं, फिर भी प्रदीप शाह ने बाद में दून को पुनः प्राप्त किया। साहित्य और कला के क्षेत्र में मेधाकर शर्मा तथा मौलाराम को संरक्षण देकर उन्होंने गढ़वाल की सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध किया। इसलिए प्रदीप शाह का काल राजनीतिक, कूटनीतिक और सांस्कृतिक—तीनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है।