राजा मानवेन्द्र शाह |Tehri Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा मानवेन्द्र शाह टिहरी गढ़वाल रियासत के अंतिम राजा तथा पंवार/परमार राजवंश के अंतिम शासक थे। उनका राज्याभिषेक 5 अक्टूबर 1946 ई. को हुआ। उनके शासनकाल में टिहरी रियासत के भारत में विलय की प्रक्रिया पूरी हुई। इस अवधि में टिहरी प्रजामंडल आंदोलन, सकलाना विद्रोह, कीर्तिनगर आंदोलन तथा अंतरिम मंत्रिपरिषद जैसी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हुईं। 15 फरवरी 1948 ई. को अंतरिम मंत्रिपरिषद ने शपथ ली और ज्योति प्रसाद को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। अंततः 1 अगस्त 1949 ई. को टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ। स्वतंत्र भारत में मानवेन्द्र शाह ने सक्रिय राजनीतिक जीवन अपनाया और वे लंबे समय तक टिहरी गढ़वाल से लोकसभा सदस्य रहे। उनका निधन 5 जनवरी 2007 ई. को हुआ।
1. राज्याभिषेक एवं अंतिम राजा
- 5 अक्टूबर 1946 ई. को महाराजा मानवेन्द्र शाह का राज्याभिषेक हुआ।
- वे टिहरी गढ़वाल रियासत के अंतिम राजा थे।
- उन्हें पंवार/परमार राजवंश का अंतिम शासक भी माना जाता है।
- उनका राज्यारोहण टिहरी रियासत के इतिहास के उस अंतिम चरण में हुआ, जब भारत की स्वतंत्रता और रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी।
2. टिहरी में राजनीतिक परिवर्तन
- 28 अप्रैल 1947 ई. को टिहरी में शांति रक्षा अधिनियम बनाया गया।
- 15 अगस्त 1947 ई. के समय टिहरी प्रजामंडल के अध्यक्ष परिपूर्णानंद पैन्यूली थे।
- स्वतंत्रता के बाद टिहरी राज्य में राजशाही व्यवस्था और प्रजामंडल के बीच राजनीतिक संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
- 1948 ई. में टिहरी प्रजामंडल और राजा के बीच बैठक हुई, जिसमें संविधान सभा के निर्वाचन पर सहमति बनी।
3. सकलाना विद्रोह एवं कीर्तिनगर आंदोलन
- 1947 ई. में टिहरी में सकलाना विद्रोह हुआ।
- 1948 ई. में कीर्तिनगर आंदोलन हुआ।
- कीर्तिनगर आंदोलन के दौरान भोलाराम और नागेंद्र सकलानी शहीद हुए।
- इन आंदोलनों ने टिहरी राज्य में राजशाही के विरुद्ध जन-आंदोलन और राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
4. अंतरिम मंत्रिपरिषद
- टिहरी राज्य में 15 फरवरी 1948 ई. को अंतरिम मंत्रिपरिषद ने शपथ ली।
- ज्योति प्रसाद को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
- यह टिहरी राज्य में राजशाही से प्रतिनिधि शासन की ओर संक्रमण की महत्वपूर्ण घटना थी।
5. संविधान सभा
- टिहरी राज्य की संविधान सभा ने कुल 49 बैठकें कीं।
- संविधान सभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम दत्त रतूड़ी थे।
- संविधान सभा का गठन राज्य में भावी शासन व्यवस्था के निर्माण की प्रक्रिया से संबंधित था।
6. टिहरी रियासत का भारत में विलय
- 1 अगस्त 1949 ई. को टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ।
- विलय के बाद टिहरी को संयुक्त प्रांत (United Provinces) का 50वाँ जिला बनाया गया।
- यह गढ़वाल मंडल का चौथा जिला बना।
- टिहरी रियासत के भारत में विलय के साथ टिहरी की राजशाही व्यवस्था का औपचारिक अंत हुआ।
- विलय संबंधी प्रक्रिया में परिपूर्णानंद पैन्यूली द्वारा सर्वप्रथम हस्ताक्षर किए जाने का उल्लेख मिलता है।
7. राजमाता कमलेन्दुमति शाह
- राजमाता कमलेन्दुमति शाह स्वतंत्र भारत की राजनीति में भी सक्रिय रहीं।
- वे प्रथम लोकसभा में टिहरी से सांसद चुनी गईं।
- 1958 ई. में समाज सेवा के लिए उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
8. मानवेन्द्र शाह का राजनीतिक जीवन
- टिहरी रियासत के भारत में विलय के बाद मानवेन्द्र शाह ने सक्रिय लोकतांत्रिक राजनीति में भाग लिया।
- वे 1957 से 2004 ई. के बीच टिहरी गढ़वाल से 8 बार लोकसभा सांसद रहे।
- 1971 ई. के लोकसभा चुनाव में वे परिपूर्णानंद पैन्यूली से चुनाव हार गए थे।
- इसके अतिरिक्त वे लंबे समय तक टिहरी गढ़वाल का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख राजनीतिक व्यक्तियों में रहे।
9. मानवेन्द्र शाह का निधन
- मानवेन्द्र शाह का निधन 5 जनवरी 2007 ई. को हुआ।
- उनके निधन के साथ टिहरी राजपरिवार के उस प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व का जीवन समाप्त हुआ जिसने राजशाही और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति—दोनों चरणों को देखा।
निष्कर्ष
राजा मानवेन्द्र शाह का काल टिहरी गढ़वाल के राजशाही से लोकतांत्रिक व्यवस्था में संक्रमण का अंतिम चरण था। 5 अक्टूबर 1946 ई. को राज्याभिषेक के बाद उन्होंने टिहरी रियासत के अंतिम राजा के रूप में कार्य किया। उनके समय प्रजामंडल की राजनीतिक गतिविधियाँ, 1947 का सकलाना विद्रोह, 1948 का कीर्तिनगर आंदोलन, अंतरिम मंत्रिपरिषद और संविधान सभा जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। 15 फरवरी 1948 को अंतरिम मंत्रिपरिषद के गठन ने प्रतिनिधि शासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रखा। अंततः 1 अगस्त 1949 ई. को टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ और सदियों पुरानी पंवार/परमार राजवंशीय शासन-परंपरा का अंत हुआ। इसके बाद मानवेन्द्र शाह ने स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और 1957–2004 के बीच आठ बार लोकसभा सदस्य रहे। इस प्रकार उनका जीवन टिहरी के राजशाही युग से लोकतांत्रिक भारत तक के ऐतिहासिक संक्रमण से जुड़ा हुआ है।