सुदर्शन शाह भाग -3
15. धार्मिक कार्य एवं मंदिरों का संरक्षण
- सुदर्शन शाह धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे।
- उन्होंने बाड़ाहाट, चंद्रवदनी आदि स्थानों के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया।
- उन्होंने मंदिरों की उचित व्यवस्था एवं संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास किए।
- उनके धार्मिक कार्यों की जानकारी बाड़ाहाट प्रशस्तियों, ताम्रपत्रों तथा पहाड़ी कागज पर लिखे शासनादेशों से प्राप्त होती है।
- उनके काल में सत्यानंद, दुर्गादत्त तथा वासवानंद प्रसिद्ध ज्योतिषी हुए।
16. राजभवन का निर्माण
- 1848 ई. में सुदर्शन शाह ने टिहरी में राजभवन का निर्माण कराया।
- इसे पुराना दरबार अथवा त्रिखंडिया राजभवन कहा जाता था।
- यह प्रताप शाह के काल तक पंवार नरेशों का निवास स्थान बना रहा।
- 1880–81 ई. में कीर्तिशाह ने नया दरबार साहब बनवाया।
- पुराना दरबार बाद में कीर्तिशाह के अनुज कुंवर विचित्रशाह के हिस्से में आया।
17. सुदर्शन शाह और ब्रिटिश अधिकारी
- सुदर्शन शाह द्वारा एक ब्रिटिश अधिकारी फ्राइडन/फ्रेजर की बाघ से जान बचाने का उल्लेख मिलता है।
- इससे सुदर्शन शाह और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच बने संबंधों के एक प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
18. 1857 की क्रांति और सुदर्शन शाह
- 1857 की क्रांति के दौरान सुदर्शन शाह ने ब्रिटिश सरकार की सहायता की।
- उनकी इस सहायता के कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें बिजनौर प्रांत देने का प्रस्ताव किए जाने का उल्लेख मिलता है।
- सुदर्शन शाह की इच्छा श्रीनगर गढ़वाल एवं देहरादून प्राप्त करने की थी।
- इसी बीच जून 1859 ई. में सुदर्शन शाह की मृत्यु हो गई।
- उनकी मृत्यु के कारण इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका।
19. सुदर्शन शाह का शासनकाल और ऐतिहासिक महत्व
- सुदर्शन शाह का शासनकाल 1815 से 1859 ई. तक रहा।
- वे टिहरी रियासत में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजा थे।
- उनके शासनकाल में टिहरी रियासत की राजनीतिक सीमाओं, प्रशासन, राजस्व, न्याय एवं जागीर व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया।
- वे केवल राजनीतिक शासक नहीं थे, बल्कि कला, साहित्य, धर्म एवं संस्कृति के संरक्षक भी थे।
- उनके शासनकाल में टिहरी एक राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और आगे चलकर यही क्षेत्र टिहरी रियासत की राजधानी बना रहा।
निष्कर्ष
राजा सुदर्शन शाह का शासनकाल टिहरी गढ़वाल के राजनीतिक एवं प्रशासनिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 1815 ई. में गढ़वाल के विभाजन और टिहरी रियासत की स्थापना के साथ उनके शासन का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ। उन्होंने लंबे निर्वासन एवं संघर्ष के बाद अपने राज्य के एक भाग को पुनः प्राप्त किया और 28 दिसंबर 1815 ई. को टिहरी को राजधानी बनाया। उनके समय में राजस्व एवं न्याय व्यवस्था को संगठित किया गया तथा जागीरदारों की मनमानी पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया। सकलाना और अठूर जैसे जन-आंदोलनों के संदर्भ में भी उनका हस्तक्षेप उल्लेखनीय रहा। इसके साथ ही उन्होंने मंदिरों, चित्रकारों, साहित्यकारों एवं विद्वानों को संरक्षण दिया और स्वयं सभासार जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। 1859 ई. में उनकी मृत्यु के साथ उनका लंबा शासन समाप्त हुआ, लेकिन टिहरी रियासत की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नींव पर उनका प्रभाव आगे भी बना रहा।