राजा ललित शाह (1773–1780 ई.) |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा ललित शाह पंवार/परमार वंश के 52वें शासक माने जाते हैं। वे राजा प्रदीप शाह के पुत्र थे और उनके बाद गढ़वाल की गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल में गढ़वाल को दून क्षेत्र में सिख आक्रमणों, सिरमौर के साथ संघर्ष तथा कुमाऊँ के चंद राज्य के आंतरिक राजनीतिक संकट जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। ललित शाह की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि कुमाऊँ की राजनीति में हस्तक्षेप से जुड़ी थी। चंद राज्य में उत्पन्न गुटबाजी का लाभ उठाकर उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया और हर्षदेव जोशी को उसका प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इस प्रकार गढ़वाल और कुमाऊँ के राजनीतिक संबंधों में एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ। ललित शाह के संबंध में जानकारी मुख्यतः मौलाराम के ‘गढ़राजवंश काव्य’ तथा सिख ग्रंथों से प्राप्त होती है।
प्रमुख बिंदु
- वंशावली के अनुसार राजा ललित शाह पंवार/परमार वंश के 52वें शासक थे। वे राजा प्रदीप शाह के पुत्र थे और उनके बाद गढ़वाल की गद्दी पर बैठे।
- ललित शाह के संबंध में जानकारी मुख्यतः मौलाराम के ‘गढ़राजवंश काव्य’ तथा सिख ग्रंथों से प्राप्त होती है।
- ललित शाह के शासनकाल में 1775 ई. तथा 1778 ई. में सिख सेना ने दून क्षेत्र पर आक्रमण किया और वहाँ लूटपाट की। इन आक्रमणों का उद्देश्य मुख्यतः धन अर्जित करना था।
- 1779 ई. में ललित शाह ने सिरमौर राज्य पर आक्रमण किया। उसने बैरागढ़ पर विजय प्राप्त की।
- बैरागढ़ की विजय से उत्साहित होकर ललित शाह ने कालसी पर भी आक्रमण किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अंततः दोनों राज्यों के बीच संधि हो गई और इस अभियान में ललित शाह को आर्थिक हानि उठानी पड़ी।
- ललित शाह के समय चंद राज्य की आंतरिक राजनीतिक स्थिति अत्यंत खराब थी। 1764 ई. में शिवदेव जोशी की मृत्यु के बाद चंद राज्य में षड्यंत्र और गुटबंदी बढ़ती गई।
- 1777 ई. में दीपचंद तथा उसके पुत्रों की हत्या कर दी गई और उसके बाद मोहन चंद चंद राज्य का राजा बना।
- मोहन चंद के राजा बनने से हर्षदेव जोशी, जयानन्द जोशी तथा उनके सहयोगी असंतुष्ट थे। वे मोहन चंद को हटाकर चंद राज्य की सत्ता अपने अनुकूल व्यक्ति के हाथों में देना चाहते थे।
- इसी उद्देश्य से जोशी बंधुओं ने ललित शाह से मित्रता की और उसे अल्मोड़ा राज्य का लालच देकर सैन्य सहायता देने के लिए तैयार किया।
- ललित शाह ने जोशी बंधुओं के साथ मिलकर चंद सेना का सामना किया। 1779 ई. में बग्वाली पोखर का युद्ध हुआ, जिसमें मोहन चंद पराजित हुआ।
- पराजय के बाद मोहन चंद और उसका सहयोगी लाल सिंह रामपुर के नवाब फैजउल्ला खाँ के यहाँ शरण लेने चले गए।
- मोहन चंद के हटने के बाद ललित शाह ने अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया। यह गढ़वाल की कुमाऊँ की राजनीति में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था।
- ललित शाह ने हर्षदेव जोशी को प्रद्युम्न शाह का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इससे कुमाऊँ के प्रशासन में जोशी परिवार का प्रभाव स्थापित हुआ।
- प्रद्युम्न शाह ने स्वयं को दीपचंद का दत्तक पुत्र घोषित किया। इस दावे के माध्यम से उसने चंद राजवंश की वैध उत्तराधिकार परंपरा से अपने संबंध को मजबूत करने का प्रयास किया।
- ललित शाह के चार पुत्र बताए जाते हैं—जयकृत शाह/जयकीर्ति शाह, प्रद्युम्न शाह, पराक्रम शाह और प्रीतम शाह।
- ललित शाह की मृत्यु हवालाबाग के दुलड़ी नामक स्थान पर मलेरिया के कारण हुई थी।
- ललित शाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जयकृत शाह/जयकीर्ति शाह गढ़वाल की गद्दी पर बैठे।
- ललित शाह का शासनकाल गढ़वाल के इतिहास में इसलिए विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके समय गढ़वाल की सैन्य एवं राजनीतिक गतिविधियाँ कुमाऊँ की राजनीति तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँच गईं और उनके पुत्र प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी प्राप्त हुई।
निष्कर्ष
राजा ललित शाह का शासनकाल पंवार वंश के इतिहास में राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। उनके समय दून क्षेत्र को सिख आक्रमणों का सामना करना पड़ा और सिरमौर के साथ 1779 ई. का संघर्ष भी हुआ। किंतु उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुमाऊँ की चंद राजनीति में हस्तक्षेप करना था। चंद राज्य में व्याप्त गुटबंदी का लाभ उठाकर उन्होंने बग्वाली पोखर के युद्ध में मोहन चंद को पराजित किया और अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया। साथ ही हर्षदेव जोशी को प्रधानमंत्री बनाकर उन्होंने कुमाऊँ की राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित किया। इस प्रकार ललित शाह केवल गढ़वाल के शासक ही नहीं रहे, बल्कि उनके शासनकाल में पंवार शक्ति का प्रभाव कुमाऊँ तक विस्तृत हुआ। उनके बाद जयकीर्ति शाह गढ़वाल की गद्दी पर बैठे।