अजय पाल भाग -2|Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

  • कंडारागढ़ के गढ़पति गणपति नरवीर सिंह कंडारी के संबंध में परंपरा है कि अजयपाल के भय से उन्होंने मंदाकिनी नदी में आत्महत्या कर ली। कंडारागढ़ को दुगमदेश का गढ़ भी कहा जाता है। वर्तमान में यह रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है।
  • कफ्फू चौहान उप्पूगढ़ के सरदार थे।
  • कफ्फू चौहान अपने पराक्रम का वर्णन करते हुए स्वयं को पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ के समान बताते थे।
  • परंपरा के अनुसार कफ्फू चौहान की वीरता से प्रभावित होकर अजयपाल ने कहा—“वीर, तुम जीत गए और मैं हार गया।” कफ्फू चौहान के संबंध में कहा जाता है कि उन्होंने अजयपाल के सामने सिर कटवा दिया, लेकिन सिर नहीं झुकाया।
  • अजयपाल का अंतिम युद्ध उप्पूगढ़/उदयपुर के साथ हुआ बताया जाता है।
  • परंपरा के अनुसार अजयपाल ने स्वयं कफ्फू चौहान को मुखाग्नि दी थी।
  • कफ्फू चौहान पर अजयपाल की विजय का वर्णन एक गढ़वाली पवाड़े में मिलता है, जिसका उल्लेख तारादत्त गैरोला ने किया है। उप्पूगढ़ वर्तमान टिहरी जनपद में स्थित है।
  • कफ्फू चौहान की स्मृति में टिहरी में उप्पूगढ़ का मेला आयोजित किया जाता है।
  • कफ्फू चौहान को उनकी वीरता के कारण ‘गढ़वाल का महाराणा प्रताप’ कहा जाता है।
  • अजयपाल ने देवलगढ़ में सत्यनाथ भैरव मंदिर का निर्माण/जीर्णोद्धार करवाया था।
  • गौरजा मंदिर की स्थापना भी अजयपाल से संबंधित मानी जाती है।
  • राज्य की सुरक्षा के लिए अजयपाल ने सैनिक चौकियों की स्थापना की। इनमें गुजड़ूगढ़, महाबगढ़ और लंगूरगढ़ प्रमुख थे। इन चौकियों में नियुक्त सैनिकों को उनकी इच्छा के अनुसार भूमि प्रदान की जाती थी।
  • कवि भरत ने मनोदय काव्य में अजयपाल की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह अपने नाम मात्र से शत्रुओं के मन को विचलित करने वाले थे— “नाम्नैव यः शत्रुमनोविभेत्ता”।
  • हैमिल्टन के अनुसार अजयपाल प्रथम स्वतंत्र शासक थे।
  • शिवप्रसाद डबराल के अनुसार ‘गढ़वाल’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मौलाराम ने 1815 ई. में किया।
  • अजयपाल को ‘गढ़पाल’ भी कहा जाता था।
  • अजयपाल ने एक केंद्रीय सेना का निर्माण किया।
  • अजयपाल द्वारा यथेष्ठ भूमि प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह युद्ध में वीरता दिखाने वाले व्यक्तियों को प्रदान की जाने वाली भूमि से संबंधित माना जाता है।
  • 52 गढ़ों को जीतने के बाद अजयपाल ने ऐश्वर्य का त्याग कर गुरुपंथ को अपनाया। इसी कारण उन्हें ‘गढ़वाल का अशोक’ भी कहा जाता है।
  • अजयपाल ने गढ़वाल की सीमाओं के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सीमा-निर्धारण से जुड़ी लोक-उक्ति ‘अजयपाल का ओड़ा’, अर्थात् अजयपाल का सीमा-स्तंभ, प्रचलित है।
  • अजयपाल को ‘दैदीप्यमान नक्षत्र वाला राजा’ भी कहा गया है।
  • बिजनौर गजेटियर के आधार पर अजयपाल के राज्य का दक्षिणी विस्तार नजीबाबाद तथा अफजलगढ़ के कुछ क्षेत्रों तक माना गया है।
  • अजयपाल ने सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत अपने राज्य को विभिन्न मंडलों एवं पट्टियों में विभाजित किया।

निष्कर्ष

राजा अजयपाल गढ़वाल के मध्यकालीन इतिहास के सबसे प्रभावशाली पंवार शासकों में से एक थे। उन्होंने विभिन्न गढ़ों में विभाजित राजनीतिक शक्तियों को अपने नेतृत्व में संगठित कर 52 गढ़ों को एकीकृत किया और एक सुदृढ़ गढ़वाली राज्य की नींव मजबूत की। उनके शासनकाल में केंद्रीय सेना, प्रशासनिक विभाजन, माप-तौल के मानकीकरण, सैनिक चौकियों तथा भूमि-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण प्रयासों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने देवलगढ़ को राजनीतिक केंद्र बनाया और 1517 ई. में राजधानी श्रीनगर स्थानांतरित की। धार्मिक दृष्टि से वे गोरखनाथ पंथ से जुड़े थे तथा देवलगढ़ के विभिन्न धार्मिक स्थलों के विकास में उनका योगदान बताया जाता है। उनकी राजनीतिक उपलब्धियों के कारण उन्हें ‘गढ़वाल का अशोक’, ‘गढ़वाल का बिस्मार्क’ और ‘गढ़वाल का संस्थापक’ जैसे गौरवपूर्ण उपनाम प्राप्त हुए। इस प्रकार अजयपाल का शासन गढ़वाल के राजनीतिक एकीकरण और संगठित राज्य-निर्माण का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

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