रानी ईश्वरा का अभिलेख

परिचय

रानी ईश्वरा का लाखामंडल प्रशस्ति-अभिलेख उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है। इससे यमुना प्रदेश में सिंहपुर के यदु राजवंश के शासन तथा उसकी दीर्घकालीन राजनीतिक परंपरा की जानकारी मिलती है। इस प्रशस्ति में ग्यारह पीढ़ियों के बारह नृपतियों के नाम प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त यह अभिलेख तत्कालीन राजनीतिक, वैवाहिक एवं धार्मिक गतिविधियों पर भी प्रकाश डालता है। लाखामंडल में शिव मंदिर के निर्माण तथा उसकी स्मृति में प्रशस्ति खुदवाने वाली रानी ईश्वरा का उल्लेख इसे विशेष ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है।

रानी ईश्वरा का लाखामंडल प्रशस्ति-अभिलेख

  • रानी ईश्वरा की लाखामंडल प्रशस्ति से पता चलता है कि यमुना प्रदेश में कालसी के आसपास सिंहपुर में यादवों की एक शाखा शासन कर रही थी।
  • इस शिलालेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी थी।
  • प्रशस्ति की लिपि के आधार पर बूहलर ने इसे 7वीं शताब्दी ईस्वी का, जबकि कीलहॉर्न ने लगभग 7वीं शताब्दी ईस्वी के अंत का माना है। वहीं साहनी एवं जायसवाल इसे 6वीं शताब्दी ईस्वी में रखते हैं।
  • प्रशस्ति में इस राजवंश की 11 पीढ़ियों के 12 नृपतियों के नाम मिलते हैं।
  • इन शासकों की राजनीतिक स्थिति प्राक्-गुप्तकाल से कम-से-कम हर्षवर्धन के काल तक बनी रहने की संभावना व्यक्त की जाती है।
  • श्री-सेनवर्मन् को सिंहपुर के यदु राजवंश का संस्थापक माना जाता है। उसकी राजधानी यमुना प्रदेश का सिंहपुर थी।
  • सेनवर्मन् के राज्यारोहण काल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। बूहलर ने इसे चौथी शताब्दी ईस्वी के आरंभ में, जबकि जायसवाल ने लगभग 250 ईस्वी के आसपास माना है।
  • लाखामंडल प्रशस्ति में सिंहपुर को यदुओं की राजधानी के रूप में बताया गया है।
  • प्रशस्ति में उल्लिखित सिंहपुर की पहचान वर्तमान देहरादून जनपद के लाखामंडल (पुराना मढ़) से की जाती है।
  • उत्तर-गुप्तकाल में, लगभग 7वीं शताब्दी ईस्वी के अंत में, श्री-भास्करवर्मन् की पुत्री रानी ईश्वरा ने अपने पति जालंधर के राजकुमार श्री-चन्द्रगुप्त की स्मृति में लाखामंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया।
  • इसी अवसर पर रानी ईश्वरा ने लाखामंडल प्रशस्ति खुदवाई, जो इस राजवंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत है।
  • प्रशस्ति में श्री-भास्करवर्मन् के लिए ‘रिपुघाघल’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका आशय शत्रुओं के लिए वीर योद्धा अथवा शत्रु-संहारक से लिया जाता है।
  • रानी ईश्वरा का यह अभिलेख केवल वंशावली की जानकारी ही नहीं देता, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक संबंधों, वैवाहिक संबंधों एवं धार्मिक गतिविधियों पर भी प्रकाश डालता है।
  • लाखामंडल का यह अभिलेख उत्तराखंड में स्थानीय राजवंशों के निरंतर विकास तथा उत्तर-गुप्तकालीन राजनीतिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।

निष्कर्ष

रानी ईश्वरा का लाखामंडल अभिलेख उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास में वंशावली, राजनीतिक संबंधों और धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें सिंहपुर के यदु राजवंश की 11 पीढ़ियों के 12 शासकों का उल्लेख मिलता है, जिससे यमुना प्रदेश में विकसित स्थानीय राजसत्ता की निरंतरता का संकेत मिलता है। रानी ईश्वरा द्वारा अपने पति की स्मृति में निर्मित शिव मंदिर और प्रशस्ति तत्कालीन धार्मिक एवं वैवाहिक संबंधों की भी जानकारी देते हैं। इस प्रकार, यह अभिलेख उत्तराखंड के उत्तर-गुप्तकालीन राजनीतिक इतिहास और स्थानीय राजवंशों के विकास को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।

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