क्रचल देव |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
क्राचल्लदेव डोटी के मल्ल शासक एवं अशोकचल्ल के उत्तराधिकारी थे। अशोकचल्ल की मृत्यु के बाद लगभग 1212 ई. के आसपास डोटी पर उनका आधिपत्य स्थापित हुआ। उन्होंने काली-कुमाऊँ में स्वतंत्र हो चुके खस राजाओं को पराजित कर कुछ समय के लिए कमादेश (काली-कुमाऊँ) पर पुनः अधिकार स्थापित किया। उनके शासनकाल की जानकारी मुख्यतः चंपावत के बालेश्वर मंदिर के 1223 ई. के लेख, बास्ते ताम्रपत्र और दुलु स्तंभ लेख से प्राप्त होती है। वे परमबौद्ध होने के बावजूद अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु थे।
प्रमुख तथ्य क्राचल्लदेव
- अशोकचल्ल की मृत्यु के बाद डोटी पर क्राचल्लदेव का आधिपत्य स्थापित हुआ, जो संभवतः 1212 ई. के आसपास था।
- क्राचल्लदेव ने काली-कुमाऊँ में स्वतंत्र हो चुके खस राजाओं को पुनः पराजित कर अल्प समय के लिए कमादेश (काली-कुमाऊँ) पर अपना अधिकार स्थापित किया।
- चंपावत के बालेश्वर मंदिर के दानपात्र से क्राचल्लदेव का 1223 ई. का अभिलेख प्राप्त हुआ है।
- बालेश्वर मंदिर से प्राप्त क्राचल्लदेव के लेख में 10 मंडलिक राजाओं के नाम मिलते हैं। इनमें तीन चंदवंशीय मंडलिकों का भी उल्लेख है।
- बास्ते ताम्रपत्र (पिथौरागढ़) में मोहनथापा नामक मंडलिकों का उल्लेख मिलता है। इनके अधिपति शक्तिबम थे, जो मूलतः नेपाल के निवासी थे।
- मंडलिक ऐसे सामंत होते थे, जो अपने अधिपति के अधीन रहकर शासन चलाते थे।
- विजयोपरांत क्राचल्लदेव ने ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की।
- अशोकचल्ल की तरह क्राचल्लदेव भी परमबौद्ध था, लेकिन वह अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था।
- उसकी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण यह है कि उसने बालेश्वर मंदिर के पुजारी को भूमि दान दिया था।
- दुलु स्तंभ लेख में क्राचल्लदेव के पुत्र का नाम अशोकदेव मिलता है।
- क्राचल्लदेव के समय कत्यूरी एवं नाग शैली की स्थापत्य परंपराएँ प्रचलित थीं।
- कत्यूरी शैली में मंदिर का शिखर उभरा हुआ एवं ऊँचा होता था।
- नाग शैली में मंदिर का शिखर अपेक्षाकृत नीचा होता था।
निष्कर्ष
क्राचल्लदेव का शासन उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास में मल्ल शक्ति के पुनः विस्तार का महत्वपूर्ण चरण था। उन्होंने काली-कुमाऊँ के स्वतंत्र खस शासकों को पराजित कर कमादेश पर अपना अधिकार स्थापित किया और मंडलिक व्यवस्था के माध्यम से अपने प्रभाव को बनाए रखा। उनके अभिलेख तत्कालीन राजनीतिक संबंधों, सामंती व्यवस्था और धार्मिक सहिष्णुता की जानकारी देते हैं। साथ ही, उनके काल में प्रचलित कत्यूरी और नाग स्थापत्य शैलियाँ उत्तराखंड की मध्यकालीन कला एवं वास्तुकला की विविधता को दर्शाती हैं।