चंद वंश का पतन |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
चंद वंश का उदय एक छोटी-सी जमींदारी से हुआ था, जो कालांतर में विस्तृत होकर पूर्वी उत्तराखंड तथा तराई-भाबर के विशाल भू-भाग में स्थापित शक्तिशाली राज्य में परिवर्तित हो गई। रुद्रचंद, रत्नचंद, कीर्तिचंद, बाज बहादुर चंद और बालो कल्याण चंद जैसे योग्य शासकों ने अपनी सैन्य शक्ति, प्रशासनिक क्षमता और कूटनीति से चंद राज्य को सुदृढ़ किया। उन्होंने डोटी तथा गढ़वाल के पंवार राज्य जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को चुनौती दी और राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। लेकिन परवर्ती काल में योग्य नेतृत्व का अभाव, दरबारी षड्यंत्र, आर्थिक संकट, निरंतर युद्ध, बाहरी आक्रमण और प्रशासनिक कमजोरी बढ़ती गई। अंततः आंतरिक रूप से कमजोर हो चुका चंद राज्य गोरखा आक्रमण का सामना नहीं कर सका और 1790 ई. में अल्मोड़ा पर गोरखा अधिकार के साथ चंदों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गई।
चंद वंश के पतन के प्रमुख कारण
- अयोग्य उत्तराधिकारी — प्रारंभिक चंद शासकों ने साहस, धैर्य, सैन्य शक्ति और कूटनीति से एक विस्तृत राज्य का निर्माण किया था। रुद्रचंद, रत्नचंद, कीर्तिचंद, बाज बहादुर चंद और उद्योत चंद जैसे शासकों ने चंद शक्ति को ऊँचाई प्रदान की। लेकिन परवर्ती शासकों में वैसी योग्यता और दूरदर्शिता का अभाव दिखाई देता है। कमजोर राजाओं पर राज्याधिकारियों और दरबारियों का प्रभाव बढ़ता गया। विलासिता, अदूरदर्शिता और प्रशासनिक कमजोरी ने राजसत्ता को भीतर से कमजोर कर दिया।
- दरबारी षड्यंत्र एवं गुटबंदी — प्रारंभिक काल में महरा और फर्त्याल जैसे प्रभावशाली समूह राजकीय व्यवस्था का हिस्सा थे, लेकिन बाद में दरबारी गुट अपने स्वार्थों के लिए राजसत्ता में हस्तक्षेप करने लगे। सत्ता प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र, राजहत्या और उत्तराधिकार में हस्तक्षेप बढ़ा। गैड़ा बिष्ट माणिकमल और उसके पुत्र पूरनमल के षड्यंत्रों से देवी चंद और अजीत चंद का शासन विशेष रूप से प्रभावित हुआ। इस प्रकार राजदरबार शासन का केंद्र न रहकर गुटीय संघर्ष का केंद्र बन गया।
- पंवार एवं डोटी राज्यों से निरंतर संघर्ष — चंद राज्य के अपने पड़ोसी गढ़वाल के पंवार और डोटी राज्य के साथ स्थायी रूप से मधुर संबंध नहीं बन सके। अधिकांश समय सैन्य संघर्ष चलता रहा, जिससे जन-धन और राजकीय संसाधनों की भारी क्षति हुई। परवर्ती काल में जब चंद सत्ता कमजोर हुई तो इन्हीं पड़ोसी शक्तियों ने कुमाऊँ की कमजोरी का लाभ उठाया। गढ़वाल के राजा ललितशाह ने कुमाऊँ में हस्तक्षेप किया और अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को चंद गद्दी पर बैठाया।
- चंद-पंवार एकता का अभाव — गढ़वाल और कुमाऊँ के बीच लंबे समय तक संघर्ष के बावजूद कुछ अवसरों पर दोनों राज्यों ने बाहरी शत्रु के विरुद्ध सहयोग भी किया। उदाहरण के लिए दूनागिरी के युद्ध में गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह ने कल्याण चंद की सहायता की। रोहिलों के विरुद्ध इस युद्ध में गढ़वाल और कुमाऊँ की सेनाएँ पहली बार संयुक्त रूप से लड़ीं, हालांकि उन्हें पराजय मिली। कल्याण चंद पर लगाए गए तीन लाख रुपये के हर्जाने में प्रदीप शाह द्वारा सहायता किए जाने का उल्लेख मिलता है। यदि गोरखा आक्रमण के समय भी चंद-पंवार के बीच ऐसा सहयोग होता, तो गोरखों का मुकाबला अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता था। इसलिए आपसी एकता का अभाव भी चंद राज्य के पतन का महत्वपूर्ण कारण बना।
- बाहरी आक्रमणकारियों की लूट — कुमाऊँ एक समृद्ध राज्य था। इसकी संपन्नता ने बाहरी शक्तियों को आकर्षित किया। विशेष रूप से रोहिलों के आक्रमणों से चंद राज्य को भारी क्षति हुई। अल्मोड़ा तथा तराई-भाबर सहित विभिन्न क्षेत्रों में लूटपाट और विनाश ने राज्य की आर्थिक एवं प्रशासनिक शक्ति को कमजोर किया। लगातार होने वाली ऐसी घटनाओं से पहले से कमजोर चंद व्यवस्था और अधिक संकटग्रस्त हो गई।
- राजकोष का रिक्त होना — निरंतर युद्ध, बाहरी आक्रमण और राजकीय अपव्यय ने चंद राज्य की आर्थिक शक्ति को कमजोर किया। विशेष रूप से देवी चंद द्वारा स्वयं को विक्रमादित्य के समान प्रतिष्ठित करने के प्रयास में अत्यधिक धन खर्च करने की परंपरा मिलती है। उनके द्वारा दाऊद खाँ के नेतृत्व में दिल्ली अभियान चलाने और अन्य महत्वाकांक्षी योजनाओं में धन खर्च करने से राजकोष पर भारी दबाव पड़ा। कमजोर राजकोष का सीधा प्रभाव सेना, प्रशासन और किलाबंदी पर पड़ा।
- हर्षदेव जोशी की राजनीतिक भूमिका — चंद राज्य के अंतिम चरण में हर्षदेव जोशी अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति बन गए थे। उन्होंने पहले गढ़वाल के राजा ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी मिली। बाद में उन्होंने गोरखा नायक रण बहादुर शाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। इस प्रकार आंतरिक राजनीतिक संघर्षों में बाहरी शक्तियों को बुलाने की नीति ने चंद राज्य की स्वतंत्रता के लिए गंभीर संकट पैदा किया।
- राजसत्ता पर मंत्रियों एवं अधिकारियों का बढ़ता नियंत्रण — उत्तरकालीन चंद शासकों के समय राजा की वास्तविक शक्ति लगातार कमजोर होती गई और प्रभावशाली दीवानों, बिष्टों तथा अन्य अधिकारियों का प्रभाव बढ़ता गया। इससे प्रशासनिक निर्णय व्यक्तिगत एवं गुटीय हितों से प्रभावित होने लगे। परिणामस्वरूप केंद्रीय राजसत्ता की पकड़ कमजोर हुई और राज्य की राजनीतिक एकता प्रभावित हुई।
- उत्तराधिकार संघर्ष — चंद वंश के अंतिम चरण में उत्तराधिकार को लेकर बार-बार संघर्ष हुआ। अजीत चंद की हत्या, बाला कल्याण चंद को अल्पायु में गद्दी पर बैठाने का प्रयास, प्रद्युम्न शाह का आगमन और मोहन चंद का दो बार सत्ता प्राप्त करना जैसी घटनाओं ने राजसत्ता को अस्थिर किया। इससे राज्य की ऊर्जा बाहरी शत्रुओं से लड़ने के बजाय आंतरिक सत्ता संघर्षों में खर्च होती रही।
- सैन्य शक्ति का पतन — प्रारंभिक चंद शासकों की सफलता का प्रमुख आधार उनकी मजबूत सेना थी। लेकिन उत्तरकाल में आर्थिक संकट, निरंतर युद्ध, प्रशासनिक अव्यवस्था और कमजोर नेतृत्व के कारण चंद सेना की प्रभावशीलता घटती गई। दूसरी ओर गोरखों की सेना संगठित और युद्ध-कुशल थी। इसलिए जब गोरखों ने कुमाऊँ पर निर्णायक अभियान चलाया, तो चंद राज्य प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सका।
- बाहरी शक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता — अंतिम चरण में चंद शासकों और उनके विरोधी गुटों ने अपने राजनीतिक संघर्षों में मुगलों, गढ़वाल, रामपुर तथा गोरखों जैसी बाहरी शक्तियों का सहारा लिया। इससे राज्य की आंतरिक स्वायत्तता कमजोर हुई। विशेष रूप से गोरखों को आमंत्रित करना अंततः चंद सत्ता के लिए घातक सिद्ध हुआ।
- गोरखा आक्रमण और अंतिम पतन — उपर्युक्त सभी कारणों से चंद राज्य भीतर से अत्यंत कमजोर हो चुका था। हर्षदेव जोशी द्वारा गोरखा नायक रण बहादुर शाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किए जाने के बाद गोरखा शक्ति ने निर्णायक अभियान चलाया। 1790 ई. में अल्मोड़ा पर गोरखों का अधिकार हो गया और चंदों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई। इस प्रकार गोरखा विजय चंद वंश के पतन का अंतिम और निर्णायक चरण थी।
निष्कर्ष
चंद वंश का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि दीर्घकालीन आंतरिक और बाहरी कारणों की संयुक्त परिणति था। प्रारंभिक चंद शासकों की योग्यता, मजबूत सेना और कुशल कूटनीति ने जिस विशाल राज्य का निर्माण किया था, वह परवर्ती काल में अयोग्य उत्तराधिकारियों, दरबारी षड्यंत्रों, उत्तराधिकार संघर्ष और अधिकारियों के बढ़ते प्रभाव से कमजोर होता गया। दूसरी ओर डोटी और पंवार राज्य से निरंतर युद्ध, रोहिलों की लूट तथा राजकोष के अत्यधिक व्यय ने आर्थिक एवं सैन्य शक्ति को क्षीण कर दिया। सबसे गंभीर समस्या यह थी कि आंतरिक राजनीतिक गुटों ने अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए बाहरी शक्तियों को कुमाऊँ में आमंत्रित करना शुरू कर दिया। हर्षदेव जोशी द्वारा गोरखों को आमंत्रण इस प्रक्रिया की निर्णायक परिणति बना। अंततः 1790 ई. में गोरखों द्वारा अल्मोड़ा पर अधिकार के साथ चंदों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गई। इस प्रकार चंद वंश का पतन मुख्यतः आंतरिक विघटन और बाहरी आक्रमणों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था।