राजा दीपचंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा दीपचंद चंद वंश के उत्तरकालीन शासकों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे 1748 ई. में कुमाऊँ की गद्दी पर बैठे और उनके शासनकाल में कुमाऊँ को व्यापक भारतीय राजनीतिक घटनाओं से जुड़ना पड़ा। उनके समय में प्लासी का युद्ध, पानीपत का तृतीय युद्ध और बक्सर का युद्ध जैसी निर्णायक घटनाएँ हुईं। विशेष रूप से 1761 ई. के तीसरे पानीपत युद्ध में मुगल बादशाह के आग्रह पर कुमाऊँ से सैनिक भेजे गए। दीपचंद अपने मिलनसार और दयालु स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे, किंतु उनकी अत्यधिक उदारता ने जागीरों के वितरण को बढ़ाया। उनके शासन में वास्तविक प्रशासन पर शिवदेव जोशी का प्रभाव रहा। अंततः दरबारी संघर्ष में दीपचंद और उनके दो पुत्रों की सीराकोट के किले में मृत्यु हुई।

प्रमुख तथ्य

  • 1748 ई. में दीपचंद कुमाऊँ के शासक बने। अल्पवयस्क होने के कारण प्रारंभ में राज्य की वास्तविक शक्ति शिवदेव जोशी के हाथों में रही।
  • दीपचंद के शासनकाल में भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं—प्लासी का युद्ध, पानीपत का तृतीय युद्ध और बक्सर का युद्ध।
  • 1761 ई. के तीसरे पानीपत युद्ध में मुगल बादशाह के कहने पर दीपचंद ने मराठों के विरुद्ध कुमाऊँनी सैनिक टुकड़ी भेजी।
  • पानीपत के युद्ध में लगभग 4,000 कुमाऊँनी सैनिक भेजे गए। उनका नेतृत्व सेनापति हरिराम तथा उपसेनापति बीरबल नेगी ने किया।
  • कुमाऊँनी सैनिकों ने युद्ध में पर्वतीय हथियारों का प्रयोग किया। एटकिंसन के अनुसार पहाड़ी सैनिकों ने रॉकेट और हैंडग्रेनेड के प्रयोग में अच्छा कौशल दिखाया।
  • युद्ध समाप्त होने के बाद मुगल बादशाह ने कुमाऊँनी सेनापति से मिलने की इच्छा जताई और मकना नामक हाथी, आभूषण तथा अन्य वस्तुएँ राजा दीपचंद के लिए भेजीं।
  • दीपचंद मिलनसार और दयालु राजा थे। वे किसी याचक को निराश नहीं करते थे और इसी कारण उन्होंने बहुत-सी जागीरें प्रदान कीं।
  • फ्रांसिस हैमिल्टन ने नेपाल के इतिहास में दीपचंद को गूँगा बताया है।
  • इतिहासकार रुद्रदत्त पंत ने शिवदेव जोशी को ‘कुमाऊँ का बैरम खाँ’ कहा है।
  • शिवदेव जोशी ने राज्य के विरोधियों और षड्यंत्रकारियों पर नियंत्रण बनाए रखा।
  • बाद में काशीपुर में सैनिकों ने शिवदेव जोशी को घेरकर मार दिया। उनके साथ उनके पुत्र हर्षदेव जोशी भी थे, लेकिन वे बच निकले।
  • शिवदेव जोशी की मृत्यु के बाद दीपचंद हर्षदेव जोशी को दीवान बनाना चाहते थे, जबकि राजा की प्रिय रानी श्रृंगार मंजरी मोहन सिंह रौतेला को दीवान बनाना चाहती थीं।
  • मोहन सिंह रौतेला ने षड्यंत्रपूर्वक हर्षदेव जोशी के भाई जयकृष्ण जोशी की हत्या करवा दी और हर्षदेव को कैद कर लिया।
  • मोहन सिंह ने राजा दीपचंद को भी कैद कर लिया। अंततः 1777 ई. के अंत में दीपचंद और उनके दो पुत्रों की सीराकोट के किले में मृत्यु हुई।
  • दीपचंद की मृत्यु को लेकर प्रसिद्ध प्रश्न है—“शाहजहाँ की तरह तड़प-तड़पकर मृत्यु किस चंद शासक की हुई?” — उत्तर: दीपचंद।

निष्कर्ष

राजा दीपचंद का शासन चंद वंश के राजनीतिक पतन और दरबारी संघर्षों का प्रतीक बन गया। प्रारंभ में अल्पवयस्क होने के कारण शिवदेव जोशी ने प्रशासन संभाला और उनके समय में कुमाऊँ की सेना ने 1761 ई. के पानीपत के तृतीय युद्ध में भाग लिया। दीपचंद स्वयं अत्यंत दयालु और उदार थे, जिसके कारण उन्होंने अनेक जागीरें प्रदान कीं। लेकिन दरबार में बढ़ते गुटीय संघर्ष और षड्यंत्रों ने उनकी स्थिति कमजोर कर दी। शिवदेव जोशी की हत्या के बाद सत्ता-संघर्ष और तीव्र हुआ तथा मोहन सिंह रौतेला के षड्यंत्रों के परिणामस्वरूप दीपचंद और उनके दो पुत्रों को कैद कर लिया गया। अंततः 1777 ई. में सीराकोट के किले में उनकी मृत्यु हुई। इस प्रकार दीपचंद का काल सैन्य योगदान के साथ-साथ दरबारी षड्यंत्र, राजनीतिक अस्थिरता और चंद सत्ता के निरंतर कमजोर होने के लिए जाना जाता है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *