राजा अजीत चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा अजीत चंद चंद वंश के इतिहास में एक ऐसे शासक थे जिनका शासनकाल अत्यंत अल्प एवं राजनीतिक षड्यंत्रों से प्रभावित रहा। राजा देवी चंद के बाद वे चंद सिंहासन पर बैठे, किंतु उनके शासन में वास्तविक सत्ता पर प्रभावशाली बिष्ट दरबारियों का प्रभाव बना रहा। विशेष रूप से गैड़ा बिष्ट माणिकमल और उसके पुत्र पूरनमल की राजनीतिक भूमिका अत्यधिक प्रभावशाली थी। इनके प्रभुत्व और अन्यायपूर्ण शासन को कुमाऊँ की परंपरा में ‘गैड़ागर्दी’ कहा गया। अंततः अजीत चंद की हत्या भी इन्हीं दरबारियों द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार को लेकर पुनः गंभीर संकट उत्पन्न हुआ, जिसने चंद राज्य की राजनीतिक स्थिति को और कमजोर किया।

प्रमुख बिंदु

  • राजा देवी चंद के पश्चात् नरपत सिंह कठेड़िया के पुत्र अजीत सिंह चंद वंश की गद्दी पर बैठे और ‘अजीत चंद’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • रोहिलखंड क्षेत्र के पीपली के राजा नरपत सिंह कठेड़िया के साथ चंद वंश का वैवाहिक संबंध था। परंपरा के अनुसार राजा ज्ञान चंद की पुत्री का विवाह नरपत सिंह कठेड़िया के साथ हुआ था। उनके पुत्र अजीत सिंह थे।
  • अजीत चंद के शासनकाल में पूरनमल और उसके पिता गैड़ा बिष्ट माणिकमल का शासन एवं प्रशासन पर अत्यधिक प्रभाव था।
  • माणिकमल और पूरनमल के प्रभाव तथा उनके अन्यायपूर्ण शासन को कुमाऊँ की लोकपरंपरा में ‘गैड़ागर्दी’ कहा गया।
  • अंततः पूरनमल और गैड़ा बिष्ट माणिकमल द्वारा राजा अजीत चंद की हत्या किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • अजीत चंद की हत्या के बाद पूरनमल और माणिकमल ने नरपत सिंह कठेड़िया के पास जाकर उनके दूसरे पुत्र को चंद राज्य का राजा बनाने का प्रयास किया।
  • नरपत सिंह को यह जानकारी हो गई थी कि अजीत चंद की हत्या में पूरनमल और माणिकमल की भूमिका थी। इसलिए उन्होंने अपने दूसरे पुत्र को चंद राज्य का राजा बनाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
  • इसके बाद पूरनमल और माणिकमल ने अजीत चंद की रानी के पुत्र को गद्दी पर बैठाने का प्रयास किया। उस समय यह बालक मात्र 18 माह का बताया जाता है।
  • इस बालक को बाला कल्याण चंद के नाम से चंद सिंहासन पर बैठाया गया। इतनी कम आयु के बालक को राजा बनाए जाने की स्थिति को जनता ने स्वीकार नहीं किया और इसका विरोध हुआ।
  • जनता के विरोध के बाद चंद सिंहासन पर कल्याण चंद पंचम को बैठाया गया, जिन्हें परंपरा में लक्ष्मी चंद के पुत्र नारायण चंद के वंशज के रूप में बताया जाता है।
  • इस प्रकार अजीत चंद की मृत्यु के बाद उत्पन्न उत्तराधिकार संकट और दरबारी हस्तक्षेप ने चंद राज्य की राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ा दिया।

निष्कर्ष

राजा अजीत चंद का शासन चंद वंश के राजनीतिक पतन और दरबारी हस्तक्षेप के दौर की महत्वपूर्ण कड़ी था। उनके समय में राजा की तुलना में गैड़ा बिष्ट माणिकमल और पूरनमल जैसे प्रभावशाली दरबारियों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। इनके अन्यायपूर्ण प्रभाव को कुमाऊँ की परंपरा में ‘गैड़ागर्दी’ के नाम से जाना गया। अंततः अजीत चंद की हत्या ने चंद राज्य में उत्तराधिकार का गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया। हत्यारों द्वारा नरपत सिंह कठेड़िया के पुत्र को गद्दी पर बैठाने का प्रयास असफल रहा और बाद में अत्यंत छोटे बालक बाला कल्याण चंद को राजा बनाया गया। जनता द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद कल्याण चंद पंचम को गद्दी पर बैठाया गया। इस प्रकार अजीत चंद का काल दरबारी षड्यंत्र, राजहत्या, उत्तराधिकार संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *