राजा बाज बहादुर चंद भाग -2

  • उनके दरबार में पानी भरने वाले को ‘पनेरू’, फल लाने वाले को ‘फुलेरिया’, प्रातः हर-हर की आवाज से राजपरिवार को जगाने वाले को ‘हरबोला’ तथा मंदिरों की रक्षा करने वाले को ‘मठपाल’ कहा जाता था।
  • बाज बहादुर के समय गढ़वाल के पंवार राजा और उनके बीच संघर्ष जारी रहा। पंवार राजा मोदिनीशाह ने एक अवसर पर औरंगजेब से शिकायत की कि बाज बहादुर के पास बहुत अधिक सोना है। इसके परिणामस्वरूप मुगल सेना ने तराई-भाबर पर अधिकार कर लिया, लेकिन बाज बहादुर अलीवर्दी खाँ की सहायता से औरंगजेब को समझाने में सफल रहे और अपने राज्य को आगे की शाही कार्रवाई से बचा लिया।
  • 1662 ई. में बाज बहादुर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने सम्राट को अनेक पर्वतीय पक्षी उपहार में दिए, जिसके बदले औरंगजेब ने उन्हें रत्नजड़ित तलवार प्रदान की।
  • बाज बहादुर के लिए प्रचलित कहावत “बरस भयो अस्सी, बुद्धि गयी नस्सी” उनके वृद्धावस्था के संबंध में प्रसिद्ध है। इससे उनकी वृद्धावस्था में लोकप्रियता में कमी आने की लोकधारणा का संकेत मिलता है।
  • एटकिंसन ने बाज बहादुर को उदास, बूढ़ा और अन्यायी राजा बताया है।
  • विद्वान अनंतदेव ने बाज बहादुर के संरक्षण में ‘स्मृति कौस्तुभ’ नामक ग्रंथ की रचना की थी।
  • बाज बहादुर धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे। उन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार करवाया।
  • उनके प्रमुख निर्माण कार्यों में कटारमल सूर्य मंदिर का जीर्णोद्धार, भीमताल के भीमेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण, पीनाथ मंदिर, तथा हरियाडुंगरी में शिव मंदिर का निर्माण शामिल माना जाता है।
  • थल (पिथौरागढ़) का ‘एक हथिया देवाल’ भी बाज बहादुर चंद से संबंधित प्रमुख स्थापत्य स्मारक है। इसे एक बड़े पाषाण-खंड को तराशकर बनाया गया है और इसकी स्थापत्य शैली की तुलना एलोरा के कैलाश मंदिर से की जाती है।
  • बाज बहादुर चंद को उत्तराखंड में जजिया कर लगाने वाला चंद शासक माना जाता है। यह कर औरंगजेब के काल से संबंधित था।
  • बाज बहादुर को कुमाऊँ में नमक कर लगाने वाला पहला शासक भी माना जाता है।
  • बाज बहादुर चंद को चरवाहे से राजा बनने वाला एकमात्र चंद शासक बताया जाता है। उनके पिता का नाम नीलू गुसाईं बताया जाता है।
  • बाज बहादुर चंवर, कस्तूरी, सोने-चाँदी के बर्तन आदि बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर मुगल बादशाह शाहजहाँ के दरबार में पहुँचे थे।
  • एटकिंसन के अनुसार, मुगल दरबार को प्रसन्न रखने के लिए बाज बहादुर प्रत्येक परिवार से एक रुपये का कर लेते थे।
  • गढ़वाल पर विजय के प्रतीक के रूप में नंदा देवी की मूर्ति को गढ़वाल से लाकर अल्मोड़ा के किले में स्थापित करने की परंपरा भी बाज बहादुर से संबंधित है।
  • बाज बहादुर चंद का एक चित्र न्यूयॉर्क के संग्रहालय में सुरक्षित होने का उल्लेख मिलता है।
  • बाज बहादुर ने जजिया के समान व्यक्ति कर अथवा पोल टैक्स लगाया था।
  • उनके शासनकाल में ‘मांगा कर’ लगाए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

निष्कर्ष

राजा बाज बहादुर चंद चंद वंश के अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी शासकों में गिने जाते हैं। उनके शासनकाल में कुमाऊँ की राजनीति का संबंध केवल स्थानीय शक्तियों से ही नहीं, बल्कि मुगल साम्राज्य, गढ़वाल और तिब्बत से भी जुड़ा रहा। उन्होंने मुगल सहायता से नौलखिया माल/चौरासी माल को पुनः प्राप्त कर चंद राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और बाजपुर बसाया। गढ़वाल के साथ संघर्षों में उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, जबकि 1670 ई. का तिब्बत अभियान मानसरोवर यात्रा और भोटान्तिक व्यापार की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। धार्मिक क्षेत्र में नंदा देवी की मूर्ति की स्थापना, गूँठ भूमिदान तथा मंदिर निर्माण-जीर्णोद्धार उनके योगदान को दर्शाते हैं। दूसरी ओर जजिया, नमक कर, व्यक्ति कर और मांगा कर जैसे कर उनके शासन के कठोर पक्ष को भी सामने लाते हैं। इस प्रकार बाज बहादुर चंद का शासन सैन्य शक्ति, कूटनीति, प्रशासन, धार्मिक संरक्षण और आर्थिक नीतियों के समन्वय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

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