राजा विजयचंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा विजयचंद चंद वंश के उन शासकों में माने जाते हैं जिनका शासनकाल राजदरबार के आंतरिक संघर्ष, षड्यंत्र और सत्ता-संघर्ष के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उनके समय में राजसत्ता पर प्रभावशाली दरबारियों का प्रभाव बढ़ गया था और उत्तराधिकार को लेकर भी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई। विजयचंद से संबंधित पाभै (पिथौरागढ़) का ताम्रपत्र उनके समय के सामाजिक एवं धार्मिक संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। उनके शासन के अंतिम चरण में दरबारी षड्यंत्रों ने गंभीर रूप ले लिया और अंततः शकराम/सुखराम कार्की द्वारा उनकी हत्या किए जाने की परंपरा मिलती है। उनकी मृत्यु के बाद चंद राज्य में महरा–फर्त्याल संघर्ष प्रारंभ हुआ, जिसने उत्तराधिकार की राजनीति को और जटिल बना दिया।

प्रमुख बिंदु

  • विजयचंद के बाद दिलीप चंद चंद राज्य की गद्दी पर बैठा।
  • विजयचंद से संबंधित पाभै (पिथौरागढ़) का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है, जो उनके समय का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है।
  • इस ताम्रपत्र में विवाह कराने के उपलक्ष्य में बसु पुरोहित को चौकी (चंपावत) में पचौली नामक व्यक्ति की भूमि दिए जाने का उल्लेख मिलता है। यहाँ पचौली एक जाति-नाम था।
  • एटकिंसन के अनुसार, विजयचंद ने आधुनिक बुलंदशहर के निकट स्थित अनूपशहर के किसी बड़गूजर की पुत्री से विवाह किया था।
  • विजयचंद के विवाह को लेकर सामाजिक एवं राजवंशीय स्तर पर विवाद उत्पन्न हुआ। परंपरा के अनुसार, चंदों के बड़गूजरों के साथ वैवाहिक संबंध को स्वीकार नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप राजदरबार में अशांति फैल गई और राजकाज प्रभावित हुआ।
  • विजयचंद के समय वास्तविक राजसत्ता पर शकराम/सुखराम कार्की, पीरू गुसाईं और विनायक भट्ट नामक तीन प्रभावशाली व्यक्तियों का प्रभाव था। इन्हें सामूहिक रूप से ‘त्रिमूर्ति’ के रूप में उल्लेखित किया जाता है।
  • नीला गुसाईं, जो लक्ष्मीचंद के पुत्र बताए जाते हैं, ने इन प्रभावशाली दरबारियों के विरुद्ध आवाज उठाई। इसके परिणामस्वरूप उन्हें अंधा कर दिए जाने की परंपरा मिलती है।
  • नीला गुसाईं के पुत्र बाजा (बाज बहादुर चंद) को एक राजचेली ने कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रूप से पुरोहित श्री धर्माकार तिवाड़ी की पत्नी को सौंप दिया। इसी क्रम में नीला गुसाईं की भी मृत्यु हो गई।
  • दरबारी षड्यंत्रों और संघर्षों से परेशान होकर लक्ष्मीचंद के अन्य पुत्रों में से त्रिमलचंद गढ़वाल तथा नारायणचंद डोटी की ओर चले गए।
  • अंततः दरबारी षड्यंत्र के परिणामस्वरूप शकराम/सुखराम कार्की द्वारा राजा विजयचंद की हत्या किए जाने की परंपरा मिलती है। इस षड्यंत्र में त्रिमूर्ति, रसोई-दरोगा और राजचेली की भूमिका बताई जाती है तथा त्रिमलचंद की गुप्त सहमति होने की बात भी कही जाती है।
  • विजयचंद की हत्या के बाद चंद राज्य में महरा और फर्त्याल दलों के बीच संघर्ष प्रारंभ हो गया। यह संघर्ष मूलतः राजसत्ता पर अधिकार और उत्तराधिकारी के चयन से संबंधित था।
  • महरा दल त्रिमलचंद को चंद राज्य का शासक बनाना चाहता था, जबकि फर्त्याल दल नारायणचंद को राजा बनाने के पक्ष में था।
  • इस संघर्ष में महरा दल की विजय हुई और गढ़वाल के राजा श्यामशाह की सहायता से त्रिमलचंद को चंद राज्य का शासक बनाए जाने की परंपरा मिलती है।

निष्कर्ष

राजा विजयचंद का काल चंद वंश के इतिहास में राजनीतिक अस्थिरता और दरबारी षड्यंत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके समय में राजसत्ता पर शकराम/सुखराम कार्की, पीरू गुसाईं और विनायक भट्ट जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों का नियंत्रण बढ़ गया था। उनके विवाह से उत्पन्न सामाजिक विवाद, नीला गुसाईं के साथ हुआ संघर्ष तथा राजपरिवार के सदस्यों का अलग-अलग क्षेत्रों में चले जाना राज्य की आंतरिक स्थिति को दर्शाता है। अंततः विजयचंद की हत्या ने उत्तराधिकार के संकट को जन्म दिया और इसके बाद महरा–फर्त्याल संघर्ष शुरू हुआ। महरा दल की विजय तथा गढ़वाल के राजा श्यामशाह के सहयोग से त्रिमलचंद का राज्यारोहण इस काल की प्रमुख राजनीतिक परिणति थी। इस प्रकार विजयचंद का शासन चंद इतिहास में दरबारी राजनीति, षड्यंत्र और उत्तराधिकार संघर्ष को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है।

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