ज्ञान चंद का वीर सेनापति नीलू काठयात
परिचय
नीलू कठायत कुमाऊँ के चंद शासनकाल के एक प्रसिद्ध वीर सेनापति थे। वे चंद राजा गरुड़ ज्ञानचंद के विश्वसनीय सैनिक एवं बख्शी के रूप में कार्य करते थे। नीलू कठायत का संबंध कपरौली गाँव से था। उनकी वीरता और चंद दरबार में बढ़ते प्रभाव के कारण वे दरबारी राजनीति और षड्यंत्रों का शिकार बने। उनके जीवन से संबंधित लोक-परंपराएँ चंदकालीन दरबार में होने वाले आंतरिक संघर्षों तथा कठायत परिवार के चंद शासकों के साथ संबंधों पर प्रकाश डालती हैं।
नीलू कठायत से संबंधित प्रमुख तथ्य
- नीलू कठायत कुमाऊँ के चंद राजा गरुड़ ज्ञानचंद के वीर सेनापति थे।
- नीलू कठायत कपरौली गाँव के रहने वाले थे।
- राजा गरुड़ ज्ञानचंद ने नीलू कठायत को ‘कुमय्या खिल्लत’ प्रदान की थी। यह एक प्रकार की विशेष पोशाक थी, जो सम्मान के रूप में दी जाती थी।
- नीलू कठायत राजा गरुड़ ज्ञानचंद के बख्शी के पद पर भी कार्यरत थे।
- दरबार में होने वाले षड्यंत्रों के कारण राजा ज्ञानचंद को नीलू कठायत के विरुद्ध भड़काया गया, जिसके परिणामस्वरूप राजा ने अपने वीर सेनापति नीलू कठायत को मरवा दिया।
- जस्सा कमलेखी नीलू कठायत का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। वह नीलू कठायत की बढ़ती प्रतिष्ठा और प्रगति से ईर्ष्या करता था।
- जस्सा कमलेखी के कहने पर राजा ज्ञानचंद ने नीलू कठायत के पुत्र सुजु और वीरु की आँखें निकलवा दीं।
- राजा ज्ञानचंद के पौत्र राजा उद्यानचंद को इस घटना की जानकारी थी कि उनके दादा ज्ञानचंद ने निर्दोष नीलू कठायत को धोखे से मरवा दिया था तथा उनके दोनों पुत्रों की आँखें निकलवा दी थीं। इस कारण उद्यानचंद को काफी ग्लानि महसूस होती थी। इसी प्रायश्चित की भावना से उन्होंने अपने लगभग एक वर्ष के शासनकाल में अनेक स्थानों पर मंदिरों का निर्माण, नौलों का निर्माण तथा ब्राह्मणों द्वारा पूजा-पाठ एवं अनुष्ठान करवाए।
- चंद शासकों का कठायतों पर विश्वास कितना था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दरबारी षड्यंत्र में रसोई दरोगा की भूमिका के बाद राजा विजयचंद की हत्या हुई। इसके पश्चात राजा त्रिमलचंद ने रसोइयों और राजचेलियों के लिए नए नियम बनाए, फिर भी उन्होंने नीलू कठायत के खानदान के व्यक्ति कर्ण कठायत को रसोई दरोगा नियुक्त किया।
निष्कर्ष
नीलू कठायत का प्रसंग कुमाऊँ के चंदकालीन इतिहास में वीरता, दरबारी षड्यंत्र और राजकीय राजनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे गरुड़ ज्ञानचंद के वीर सेनापति और बख्शी थे, लेकिन दरबारी विरोध और षड्यंत्रों के कारण उन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े। उनके पुत्रों के साथ हुई घटना और बाद में उद्यानचंद द्वारा किए गए धार्मिक एवं लोककल्याणकारी कार्य इस प्रसंग को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। साथ ही, बाद के समय में कर्ण कठायत की नियुक्ति यह संकेत देती है कि इन घटनाओं के बावजूद कठायत परिवार का चंद राजदरबार में महत्वपूर्ण स्थान और विश्वास बना रहा।