तिमूर का आक्रमण |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

तैमूर लंग का शिवालिक अभियान उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। जनवरी 1399 ई. में दिल्ली से लौटते समय तैमूर ने हरिद्वार से लेकर यमुना घाटी तक के शिवालिक क्षेत्र में स्थानीय हिन्दू शासकों से संघर्ष किया। तैमूर की आत्मकथा ‘मुलफुजात-इ-तिमूरी’ में इन संघर्षों का उल्लेख मिलता है। इसमें राय बहरुज और राजा रतनसेन के साथ हुए युद्धों का वर्णन है। इन अभियानों से उस समय शिवालिक एवं आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में मौजूद स्थानीय राजाओं की राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति की जानकारी प्राप्त होती है।

1. तैमूर लंग — संक्षिप्त परिचय

  • तैमूर लंग मध्य एशिया का प्रसिद्ध विजेता और तैमूरी साम्राज्य का संस्थापक था।
  • उसका जन्म 1336 ई. में मध्य एशिया के केश (वर्तमान शाहरिसब्ज, उज़्बेकिस्तान) क्षेत्र में हुआ था।
  • तैमूर ने मध्य एशिया में अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
  • वह स्वयं को चंगेज खान की राजनीतिक विरासत से जोड़ता था और उसके अभियानों का उद्देश्य व्यापक क्षेत्रीय विस्तार था।
  • तैमूर ने भारत पर 1398 ई. में आक्रमण किया।
  • उसने दिल्ली की ओर बढ़ते हुए अनेक नगरों और क्षेत्रों पर अधिकार किया तथा दिसंबर 1398 ई. में दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
  • दिल्ली में भारी लूटपाट और नरसंहार के बाद तैमूर ने भारत से वापस लौटने का निर्णय लिया।
  • भारत से लौटते समय उसने हरिद्वार, शिवालिक और यमुना घाटी की दिशा में अभियान चलाया।
  • इसी वापसी अभियान के दौरान उसका सामना शिवालिक क्षेत्र के स्थानीय हिन्दू राजाओं से हुआ।
  • जनवरी 1399 ई. में हुए इन संघर्षों का उल्लेख उसकी आत्मकथा ‘मुलफुजात-इ-तिमूरी’ में मिलता है।

2. शिवालिक में तैमूर के युद्ध

  • जनवरी 1399 ई. में स्वदेश लौटते समय तैमूर लंग ने हरिद्वार के आसपास से लेकर यमुना घाटी तक दो प्रमुख हिन्दू राजाओं से युद्ध किया।
  • तैमूर की आत्मकथा ‘मुलफुजात-इ-तिमूरी’ के अनुसार, शिवालिक का पहला युद्ध गंगाद्वार (हरिद्वार) के आसपास राय बहरुज के साथ हुआ।
  • एटकिंसन के अनुसार, ‘बहरुज’ नाम संभवतः ब्रह्मदत्त के लिए प्रयुक्त हुआ हो सकता है।
  • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, नस्तालीक/नस्ख लिपि में लिखे इस नाम से भरोज, बरोज, वीरदत्त, ब्रह्मदत्त आदि विभिन्न नाम पढ़े जा सकते हैं।
  • तैमूर के विवरण के अनुसार राय बहरुज पर्वतीय गढ़पतियों में सबसे शक्तिशाली था।
  • जिस घाट के मुख पर बहरुज ने तैमूर का सामना करने के लिए मोर्चा संभाला था, उसे कुटिलादर्रा अथवा कुपिलादर्रा कहा गया है। यह स्थान गंगाद्वार के निकट बताया गया है।
  • शिवालिक का दूसरा युद्ध यमुना के पार हुआ, जिसमें तैमूर का सामना राजा रतनसेन से हुआ।
  • राय रतनसेन यमुना की पश्चिमी घाटी अर्थात् वर्तमान सिरमौर क्षेत्र का राजा था और उसे बहरुज से भी अधिक शक्तिशाली बताया गया है।
  • रतनसेन और तैमूर के बीच दूसरा युद्ध कूकापर्वत और शिवालिक श्रेणी के बीच स्थित दुर्गम घाटी के प्रवेश-द्वार पर हुआ था।
  • तैमूर के शिवालिक अभियान से यह संकेत मिलता है कि उस समय हरिद्वार से यमुना घाटी और सिरमौर तक स्थानीय पर्वतीय शासकों का प्रभाव विद्यमान था।
  • लोकपरंपरा में जियारानी और तैमूर के बीच युद्ध का भी उल्लेख मिलता है। लोकगाथा के अनुसार यह संघर्ष रानीबाग क्षेत्र में हुआ था और इसमें तैमूर लंग की पराजय हुई थी।

निष्कर्ष

तैमूर का शिवालिक अभियान उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास में स्थानीय पर्वतीय शक्तियों और बाहरी आक्रमणकारी शक्ति के संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण है। तैमूर की आत्मकथा में राय बहरुज और राजा रतनसेन जैसे स्थानीय शासकों का उल्लेख इस बात का संकेत देता है कि शिवालिक क्षेत्र में उस समय शक्तिशाली स्थानीय राजसत्ताएँ मौजूद थीं। हरिद्वार से यमुना घाटी और सिरमौर तक हुए संघर्षों ने तैमूर की वापसी यात्रा को भी सैन्य संघर्षों से जोड़ दिया। वहीं जियारानी से संबंधित लोकगाथा इस काल की स्मृति को उत्तराखंड की लोकपरंपरा में सुरक्षित रखती है।

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