अशोकचल्ल |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

अशोकचल्ल डोटी के मल्ल शासक थे, जिन्होंने 12वीं शताब्दी के अंत में कमादेश/काली-कुमाऊँ तथा केदारभूमि की ओर अभियान चलाकर कत्यूरी राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था। उसके अभियानों की जानकारी मुख्यतः 1191 ई. के गोपेश्वर त्रिशूल लेख, 1193 ई. के बाड़ाहाट त्रिशूल लेख तथा बोधगया अभिलेखों से प्राप्त होती है। अशोकचल्ल केवल विजेता ही नहीं, बल्कि महायान बौद्ध धर्म का अनुयायी, कवि और नृत्यशास्त्र का विद्वान भी था।

अशोकचल्ल प्रमुख तथ्य

  • डोटी के मल्ल शासक अशोकचल्ल ने 12वीं शताब्दी के अंत में कमादेश/काली-कुमाऊँ एवं केदारभूमि पर आक्रमण कर कत्यूरी राज्य के कुछ भागों को अपने अधीन कर लिया।
  • अशोकचल्ल के आक्रमण की जानकारी 1191 ई. के गोपेश्वर त्रिशूल लेख तथा 1193 ई. के बाड़ाहाट त्रिशूल लेख से मिलती है।
  • पुरुषोत्तम सिंह के बोधगया अभिलेख में अशोकचल्ल को खसदेश का राजाधिराज कहा गया है।
  • बोधगया अभिलेख से पता चलता है कि कमादेश/काली-कुमाऊँ पर अशोकचल्ल के सामंत पुरुषोत्तम सिंह के वंशजों का शासन था। उनकी राजधानी चक्रवाल थी और उनका शासनकाल लगभग 1180–1210 ई. के बीच माना जाता है।
  • सहणपाल एवं पुरुषोत्तम सिंह के बोधगया अभिलेखों में अशोकचल्ल को शिवालिक पहाड़ियों में स्थित खसदेश का राजाधिराज कहा गया है।
  • बोधगया अभिलेख के अनुसार उत्तराखंड में अशोकचल्ल के राज्य को ‘सपादलक्ष राज्य’ कहा गया है।
  • गोपेश्वर अभिलेख में अशोकचल्ल को गौड़ वंश एवं वैराथ कुल से संबंधित तथा नेपाल के दुलु का निवासी बताया गया है।
  • अशोकचल्ल का राज्य बाड़ाहाट से वैराथ/पश्चिमी नेपाल तक तथा दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों तक विस्तृत बताया गया है।
  • अशोकचल्ल का राज्य तीन प्रमुख भागों में विभाजित था—वैराथ, कमादेश और केदारभूमि।
  • गोपेश्वर अभिलेख में अशोकचल्ल को ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज’ की उपाधि दी गई है।
  • अशोकचल्ल महायान बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
  • उसने गोपेश्वर में अपने लिए ‘पदमपाद’ नामक राजप्रासाद बनवाया।
  • पदमपाद के निर्माण के अवसर पर उसने भूमि दान एवं भोज करवाए तथा अपने अधीनस्थ राजाओं को बुलाकर सम्मेलन आयोजित किया।
  • अशोकचल्ल एक उच्च कोटि का कवि भी था। उसने नाट्यशास्त्र पर ‘नृत्याध्याय’ नामक ग्रंथ की रचना की।
  • अपनी कृति ‘नृत्याध्याय’ में उसका नाम ‘अशोकमल्ल’ मिलता है, जबकि अभिलेखों में उसका नाम अशोकचल्ल मिलता है।
  • अस्कोट से प्राप्त कत्यूरी वंशावली के अनुसार अशोकचल्ल कत्यूरी वंश की मल्ल शाखा का 18वाँ शासक तथा 17वें शासक अशाल देव का पुत्र अशोक देव था।
  • अशोकचल्ल को ‘सवा लाख शिखर वाले खसदेश का राजाधिराज’ कहा गया है।
  • एटकिंसन तथा राहुल सांकृत्यायन ने बाड़ाहाट से अशोकचल्ल के अभिलेख के मिलने का उल्लेख किया है।
  • बाड़ाहाट त्रिशूल लेख में अशोकचल्ल द्वारा 1193 ई. में केदारभूमि की विजय का उल्लेख मिलता है।
  • अशोकचल्ल के अभिलेख उत्तराखंड में मल्ल शक्ति के राजनीतिक विस्तार तथा स्थानीय शासकों के साथ उसके संबंधों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

निष्कर्ष

अशोकचल्ल का शासनकाल उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास में मल्ल शक्ति के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण था। गोपेश्वर, बाड़ाहाट और बोधगया के अभिलेख उसके कमादेश, केदारभूमि और खसदेश से जुड़े अभियानों की जानकारी देते हैं। वह केवल सैन्य अभियानों के लिए ही नहीं, बल्कि महायान बौद्ध धर्म, साहित्य और नृत्यशास्त्र से अपने संबंध के कारण भी उल्लेखनीय है। उसके अभियानों ने पश्चिमी नेपाल से कुमाऊँ और गढ़वाल तक राजनीतिक संपर्क एवं प्रभाव को प्रभावित किया। इसलिए अशोकचल्ल से संबंधित अभिलेख उत्तराखंड के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में विशेष महत्व रखते हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *