बालो कल्याण चंद भाग -2
- खवास खाँ के कुमाऊँ में शरण लेने का निश्चित समय स्पष्ट नहीं है। यह घटना मानिकचंद अथवा बालो कल्याण चंद में से किसी एक के शासनकाल से संबंधित हो सकती है।
- बद्रीदत्त पांडे के अनुसार, खवास खाँ ने मानिकचंद के समय कुमाऊँ में शरण ली थी।28. बद्रीदत्त पांडे के अनुसार, मानिकचंद ने इस्लाम शाह सूर के आदेश के उत्तर में शरणागत की रक्षा की भावना व्यक्त करते हुए खवास खाँ को सौंपने से इंकार किया था।29. महाराष्ट्र के लेखक अनंतदेव ने अपने ग्रंथ स्मृति कौस्तुभ में कल्याण चंद को प्रजाहितैषी शासक बताया है।
निष्कर्ष
बालो कल्याण चंद चंद वंश के उन शासकों में थे जिन्होंने राजधानी परिवर्तन, क्षेत्रीय विस्तार, प्रशासनिक संगठन और दुर्ग निर्माण के माध्यम से चंद राज्य को नई दिशा दी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1563 ई. में अल्मोड़ा की स्थापना और उसे चंद राज्य की राजधानी बनाना थी। गंगोलीहाट, सोर और दानपुर को चंद राज्य में मिलाकर उन्होंने राज्य की सीमाओं का उल्लेखनीय विस्तार किया। विशेष रूप से सोर की प्राप्ति में उनकी कूटनीतिक क्षमता दिखाई देती है, जबकि दानपुर विजय ने चंद राज्य की सीमा को भोटान्तिक क्षेत्र के निकट पहुँचा दिया। अल्मोड़ा में लालमंडी और नेलापोखर किलों का निर्माण उनकी सैन्य दृष्टि को दर्शाता है। विभिन्न जातियों को जागीर देकर बसाना उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। स्मृति कौस्तुभ में उन्हें प्रजाहितैषी बताया गया है। इस प्रकार बालो कल्याण चंद को अल्मोड़ा के संस्थापक एवं चंद राज्य के महत्वपूर्ण विस्तारकर्ता के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है।