टिहरी रियासत की न्याय-व्यवस्था
परिचय
टिहरी रियासत में न्याय-व्यवस्था का विकास समय के साथ पारंपरिक एवं स्थानीय न्याय से संगठित न्यायालयीन व्यवस्था की ओर हुआ। प्रारंभिक काल में गढ़नरेशों, गोरखालियों और टिहरी नरेशों के समय न्यायालय राज्य की आय के महत्वपूर्ण साधनों में शामिल थे। सुदर्शनशाह ने विभिन्न स्तरों के न्यायालयों की स्थापना कर न्याय व्यवस्था को व्यवस्थित किया। आगे चलकर नरेन्द्रशाह के शासनकाल में न्यायिक सुधारों के अंतर्गत कानूनों का विधिबद्धीकरण तथा 1938 में हाईकोर्ट की स्थापना की गई। फौजदारी मामलों के लिए अलग सैशन कोर्ट एवं विभिन्न श्रेणी के मजिस्ट्रेटों की व्यवस्था भी की गई।
टिहरी रियासत की न्याय-व्यवस्था
1. प्रारंभिक न्याय व्यवस्था
- गढ़नरेशों, गोरखालियों तथा टिहरी नरेशों के शासनकाल में न्यायालय राज्य की आय के प्रमुख साधनों में शामिल थे।
- सुदर्शन शाह ने विवादों के आरंभ में वादी से शुल्क लेने की प्रथा प्रारंभ की। यह शुल्क तथा दीवानी विवादों की मालियत का शुल्क नगद रूप में राजकोष में जमा किया जाता था,जिससे हिसाब में गड़बड़ होती थी। ज्यो -ज्यो विवाद बढ़ते गये त्यों-त्यों उनके निर्णय में विलंब होता गया। प्रताप शाह ने विवादों की सुनवाई की तिथि निश्चित करने की प्रथा चलाई तथा कोर्ट फीस के टिकट लगाने प्रारंभ कर दिए।
- सुदर्शनशाह ने टिहरी राज्य में न्याय व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए निम्न न्यायालयों की स्थापना की—
- छोटी दीवानी
- बड़ी दीवानी
- सरसरी
- कलक्टरी
- जागीरदारों को अपनी जागीर के अंतर्गत आने वाले गाँवों के दीवानी एवं फौजदारी विवादों का निर्णय करने का अधिकार प्राप्त था।
- हत्या से संबंधित विवादों का अंतिम निर्णय स्वयं राजा द्वारा किया जाता था।
2. न्यायिक सुधार
- 1919 में राजा नरेन्द्रशाह ने प्रचलित नियमों को ‘नरेन्द्र हिन्दू लॉ’ के अंतर्गत विधिबद्ध कराया।
- 1938 में नरेन्द्रशाह ने हाईकोर्ट की स्थापना की।
- हाईकोर्ट में एक चीफ जस्टिस तथा एक या अधिक पुइसन जजों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
- हाईकोर्ट तथा उसके अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों पर महाराजा ने जुडिशियल कमेटी से सलाह लेकर पुनर्विचार करने का अधिकार अपने तथा अपने उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित रखा था।
3. फौजदारी न्याय व्यवस्था
- फौजदारी मामलों के निपटारे के लिए सैशन कोर्ट की स्थापना की गई।
- सैशन कोर्ट का प्रमुख अधिकारी सैशन जज होता था।
- सैशन जज के अधीन प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट कार्य करते थे।
निष्कर्ष
टिहरी रियासत की न्याय-व्यवस्था ने समय के साथ परंपरागत राजकीय न्याय से आधुनिक न्यायालयीन प्रणाली का रूप ग्रहण किया। सुदर्शनशाह द्वारा छोटी दीवानी, बड़ी दीवानी, सरसरी और कलक्टरी जैसे न्यायालय स्थापित किए जाने से न्याय व्यवस्था को संस्थागत आधार मिला। नरेन्द्रशाह के शासनकाल में 1919 में कानूनों का विधिबद्धीकरण तथा 1938 में हाईकोर्ट की स्थापना न्यायिक विकास की महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं। फौजदारी मामलों के लिए सैशन कोर्ट और विभिन्न श्रेणी के मजिस्ट्रेटों की व्यवस्था ने न्यायिक प्रशासन को और अधिक संगठित किया। इस प्रकार टिहरी रियासत में न्याय व्यवस्था क्रमशः राजा-केंद्रित व्यवस्था से संगठित एवं स्तरीकृत न्यायपालिका की ओर विकसित हुई।