कत्यूरी कालीन स्थापत्य कला |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

कत्यूरी काल उत्तराखंड के इतिहास में स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं समृद्ध काल माना जाता है। इस काल में मंदिर निर्माण की कला ने उल्लेखनीय विकास किया और अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिरों का निर्माण कराया गया। कत्यूरी स्थापत्य में स्थानीय परिस्थितियों एवं परंपराओं के साथ नागर शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। मंदिरों के निर्माण में पाषाण और काष्ठ दोनों का प्रयोग किया गया। प्राकृतिक आपदाओं के कारण अनेक प्राचीन मंदिर नष्ट हो गए हैं, फिर भी वर्तमान में सुरक्षित मंदिर कत्यूरी स्थापत्य की विशिष्टता और कलात्मक उन्नति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करते हैं।

कत्यूरी कालीन स्थापत्य कला विशेषताये

  • स्थापत्य कला की दृष्टि से कत्यूरी काल उत्तराखंड के सर्वाधिक समृद्ध कालों में से एक माना जाता है। इस काल में मंदिर निर्माण की कला ने उल्लेखनीय उन्नति प्राप्त की।
  • उत्तराखंड के अनेक प्राचीन मंदिरों का निर्माण कत्यूरी काल से संबंधित माना जाता है, जिससे इस काल की स्थापत्य कला के व्यापक विकास का पता चलता है।
  • इस काल में मंदिर स्थापत्य चरमोत्कर्ष की स्थिति तक पहुँच गया था। मंदिरों में धार्मिक उपयोगिता के साथ-साथ कलात्मक सौंदर्य पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
  • कत्यूरी शासकों द्वारा अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिरों का निर्माण एवं स्थापना कराई गई, जिससे तत्कालीन धार्मिक जीवन के साथ स्थापत्य कला के विकास का भी पता चलता है।
  • कत्यूरी कालीन मंदिरों के निर्माण में काष्ठ एवं पाषाण दोनों का प्रयोग किया गया। उत्तराखंड की स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप इन दोनों निर्माण सामग्रियों का उपयोग किया गया।
  • कत्यूरी मंदिरों पर मुख्यतः नागर शैली का प्रभाव दिखाई देता है, किंतु स्थानीय स्थापत्य परंपराओं के कारण इनमें क्षेत्रीय विशेषताएँ भी विकसित हुईं।
  • मंदिरों के निर्माण में स्थानीय पाषाणों का प्रयोग किया गया तथा अधिकांश मंदिर छोटे एवं मध्य आकार के हैं।
  • कत्यूरी कालीन मंदिरों में सामान्यतः वर्गाकार गर्भगृह का निर्माण किया गया है, जो इनके स्थापत्य विन्यास की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
  • कत्यूरी कालीन मंदिरों की स्थापत्य परंपरा को मुख्यतः दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है—(1) छत्रयुक्त मंदिर और (2) शिखरयुक्त मंदिर।1
  • शिखरयुक्त मंदिरों में द्विस्तम्भयुक्त अर्द्धमण्डप जैसी स्थापत्य विशेषताएँ देखने को मिलती हैं, जबकि छत्रशैली के मंदिरों में आमलक को ढकने के लिए काष्ठ निर्मित छत्र तथा उसके ऊपर कलश का प्रयोग किया जाता है।
  • कत्यूरी मंदिरों में परिवार या सहायक मंदिरों के समूह भी देखने को मिलते हैं। इस प्रकार के मंदिर-समूह कत्यूरी स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशेषता माने जाते हैं।
  • मंदिरों को सौंदर्यात्मक रूप प्रदान करने के लिए उनके द्वारों एवं दीवारों पर विभिन्न धार्मिक एवं अलंकरणात्मक प्रतीकों को उत्कीर्ण किया गया है।
  • मंदिरों के द्वारों पर गंगा-यमुना तथा वृक्षों की आकृतियों का अंकन मिलता है, जो धार्मिक प्रतीकात्मकता के साथ मंदिरों की कलात्मकता को भी बढ़ाता है।
  • मंदिरों की दीवारों पर पशु, पक्षी, मानव तथा युद्ध संबंधी दृश्यों का अंकन किया गया है। इससे तत्कालीन कलाकारों की विषय-विविधता एवं शिल्प-कौशल का पता चलता है।
  • मंदिरों के द्वारों एवं दीवारों पर गज-सिंह, मकर, मेष, मृग, मयूर-मिथुन तथा नाग-मिथुन जैसी आकृतियों का भी अंकन मिलता है।
  • द्वाराहाट का गूजरमल मंदिर अपनी सुंदरता एवं स्थापत्य विशेषताओं के लिए उल्लेखनीय माना जाता है। यद्यपि वर्तमान में यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, फिर भी इसके अवशेष कत्यूरी स्थापत्य की कलात्मकता को प्रदर्शित करते हैं।
  • प्राकृतिक प्रकोपों एवं समय के प्रभाव से कत्यूरी काल के अनेक मंदिर नष्ट या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इसके बावजूद बचे हुए मंदिर उत्तराखंड की प्राचीन स्थापत्य परंपरा और कत्यूरी शिल्प-कौशल के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

निष्कर्ष

कत्यूरी कालीन स्थापत्य कला उत्तराखंड की प्राचीन कला एवं संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। इस काल में मंदिर निर्माण की कला ने उच्च स्तर प्राप्त किया तथा नागर शैली, स्थानीय स्थापत्य परंपरा, पाषाण एवं काष्ठ के प्रयोग का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। वर्गाकार गर्भगृह, छोटे एवं मध्य आकार के मंदिर, द्विस्तम्भयुक्त अर्द्धमण्डप, परिवार मंदिर तथा उत्कृष्ट शिल्पांकन इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। मंदिरों के द्वारों और दीवारों पर गंगा-यमुना, वृक्ष, पशु-पक्षी, मानव एवं विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का अंकन तत्कालीन कलाकारों की उन्नत कलात्मक दृष्टि को दर्शाता है। प्राकृतिक क्षति के बावजूद आज भी सुरक्षित कत्यूरी मंदिर उत्तराखंड की समृद्ध स्थापत्य विरासत के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इस प्रकार कत्यूरी स्थापत्य ने उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक पहचान को स्थायी रूप से प्रभावित किया।

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