इष्टगणदेव|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
निम्बर के पश्चात उसका पुत्र इष्टगणदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा। वह कार्तिकेयपुर राजवंश के प्रमुख एवं प्रभावशाली शासकों में माना जाता है। उसके शासनकाल में राज्य के राजनीतिक विस्तार और एकीकरण की प्रक्रिया को गति मिली। उसने स्वयं को ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि से विभूषित किया, जो उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रभुत्व को दर्शाती है। वह शैव मत का अनुयायी था तथा धार्मिक एवं स्थापत्य गतिविधियों को भी संरक्षण प्रदान करता था। उसके पश्चात उसका पुत्र ललितसूरदेव शासक बना।
इष्टगणदेव प्रमुख तथ्य
- निम्बर के पश्चात इष्टगणदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा।
- इष्टगणदेव ने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी। यह उसकी उच्च राजनीतिक स्थिति एवं सार्वभौम सत्ता का संकेत माना जाता है।
- उसके पुत्र ललितसूरदेव के ताम्राभिलेख में इष्टगणदेव को ‘परममाहेश्वर’ तथा ‘परम ब्राह्मण’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है।
- इष्टगणदेव का पुत्र ललितसूरदेव था, जो कालांतर में अपने पिता के पश्चात कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा।
- इष्टगणदेव शैव मत का अनुयायी था। उसके शासनकाल में शैव धर्म एवं उससे संबंधित धार्मिक गतिविधियों को संरक्षण प्राप्त हुआ।
- इष्टगणदेव ने कार्तिकेयपुर राज्य की सीमाओं का विस्तार वर्तमान गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र तक किया तथा इन क्षेत्रों को एक राजनीतिक इकाई के रूप में जोड़ने का प्रयास किया।
- उसे कार्तिकेयपुर राजवंश का प्रारंभिक ऐसा शासक माना जाता है जिसने समस्त उत्तराखंड को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।
- इष्टगणदेव ने जागेश्वर में नवदुर्गा, महिषमर्दिनी, लकुलीश तथा नटराज से संबंधित मंदिरों का निर्माण करवाया। इससे उसकी धार्मिक आस्था एवं स्थापत्य संरक्षण का पता चलता है।
निष्कर्ष
इष्टगणदेव का शासन कार्तिकेयपुर राज्य के राजनीतिक विस्तार, एकीकरण और धार्मिक संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। उसकी ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ जैसी उपाधि उसके शक्तिशाली शासक होने का संकेत देती है, जबकि ललितसूरदेव के ताम्राभिलेख में प्राप्त ‘परममाहेश्वर’ एवं ‘परम ब्राह्मण’ विशेषण उसकी धार्मिक प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं। उसने गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र को एकीकृत करने का प्रयास किया तथा जागेश्वर में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाकर शैव एवं धार्मिक स्थापत्य परंपरा को संरक्षण दिया। इस प्रकार इष्टगणदेव को कत्यूरी सत्ता के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।