थानेश्वर का हर्षवर्धन वंश |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
हर्षवर्धन वंश, जिसे पुष्यभूति अथवा वर्धन वंश भी कहा जाता है,हर्षवर्धन वंश उत्तर भारत के गुप्तोत्तर काल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजवंश था। हर्षवर्धन ने थानेश्वर से अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार करते हुए बाद में कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया और उत्तर भारत के विशाल भू-भाग पर प्रभाव स्थापित किया। उत्तराखण्ड के इतिहास में हर्षवर्धन का विशेष महत्व है, क्योंकि उसके शासनकाल में इस क्षेत्र के मैदानी एवं हिमालयी भागों से राजनीतिक तथा सांस्कृतिक संपर्क के प्रमाण मिलते हैं। हर्षकालीन चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से भी तत्कालीन उत्तराखण्ड की राजनीतिक एवं धार्मिक स्थिति की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
थानेश्वर का हर्षवर्धन वंश- प्रमुख तथ्य
- हर्षवर्धन पुष्यभूति/वर्धन वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था।
- इस वंश का प्रारंभिक राजनीतिक केंद्र थानेश्वर (वर्तमान हरियाणा) था।
- हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन थे, जिन्होंने वर्धन वंश की शक्ति को मजबूत किया।
- प्रभाकरवर्धन के दो प्रमुख पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन तथा पुत्री राज्यश्री थी।
- राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी शासक गृहवर्मा से हुआ था।
- गृहवर्मा की हत्या के बाद राज्यवर्धन ने अपनी बहन की सहायता के लिए अभियान किया।
- राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद लगभग 606 ई. में हर्षवर्धन ने सत्ता संभाली।
- प्रारंभ में हर्ष का प्रमुख केंद्र थानेश्वर था, लेकिन बाद में उसने कन्नौज को अपनी राजनीतिक राजधानी बनाया।
- हर्ष ने उत्तर भारत में अपनी राजनीतिक शक्ति का व्यापक विस्तार किया।
- बाणभट्ट हर्ष का राजकवि था और उसने ‘हर्षचरित’ की रचना की।
- हर्ष द्वारा रचित संस्कृत नाटकों में ‘नागानन्द’, ‘रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ प्रमुख हैं।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग लगभग 7वीं शताब्दी में भारत आया और हर्ष के दरबार में भी रहा।
- ह्वेनसांग ने हर्ष को एक उदार एवं विद्वानों का संरक्षक शासक बताया है।
- हर्ष ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया, किंतु वह केवल बौद्ध धर्म का समर्थक नहीं था; उसके शासन में ब्राह्मण धर्म को भी संरक्षण प्राप्त था।
- हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष प्रयाग में धार्मिक एवं दान समारोह आयोजित करता था।
- हर्ष की राजनीतिक शक्ति का विस्तार मुख्यतः उत्तर भारत में था।
- दक्षिण में चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष की दक्षिण की ओर बढ़ती शक्ति को नर्मदा के क्षेत्र में रोक दिया।
- हर्ष की मृत्यु लगभग 647 ई. के आसपास मानी जाती है।
- हर्ष की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य को वैसी शक्तिशाली उत्तराधिकारी सत्ता नहीं मिल सकी और उसका व्यापक राजनीतिक संगठन धीरे-धीरे कमजोर हो गया।
उत्तराखण्ड में हर्षवर्धन — विशेष तथ्य
- हर्षवर्धन के काल में उत्तराखण्ड के मैदानी क्षेत्रों पर उसके राजनीतिक प्रभाव/शासन का उल्लेख मिलता है।
- बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ में हर्ष के हिमालय की ओर जाने का उल्लेख मिलता है, जिससे इस क्षेत्र से उसके संपर्क का संकेत मिलता है।
- हर्षकालीन चीनी यात्री ह्वेनसांग हिमालय क्षेत्र में स्थित ब्रह्मपुर राज्य गया था।
- ह्वेनसांग ने ब्रह्मपुर के लिए पो-लि-हि-मो-पु-लो नाम का प्रयोग किया।
- ह्वेनसांग के अनुसार ब्रह्मपुर में लगभग 5 बौद्ध विहार थे।
- कनिंघम ने ब्रह्मपुर की पहचान आधुनिक गढ़वाल एवं कुमाऊँ के विस्तृत क्षेत्र से की थी।
- ह्वेनसांग ने गंगा नदी को ‘महाभद्रा’ नाम से संबोधित किया।
- ह्वेनसांग के विवरण में हरिद्वार की पहचान मो-यू-लो नामक स्थान से की जाती है।
- मो-यू-लो का क्षेत्रफल ह्वेनसांग ने लगभग 20 ली बताया था।
- हर्षवर्धन द्वारा एक पर्वतीय राजकुमारी से विवाह किए जाने का उल्लेख भी मिलता है, जिसे हिमालयी क्षेत्रों से उसके संबंधों के संदर्भ में देखा जाता है।
- ह्वेनसांग का विवरण 7वीं शताब्दी के उत्तराखण्ड की धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थिति समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
- ब्रह्मपुर में बौद्ध विहारों का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि हर्षकाल में उत्तराखण्ड के कुछ क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का प्रभाव विद्यमान था।
- मौखरी सत्ता के बाद उत्तराखण्ड के मैदानी भागों में हर्षवर्धन की सत्ता का प्रभाव स्थापित होना राजनीतिक परिवर्तन की महत्वपूर्ण घटना थी।
- इस प्रकार उत्तराखण्ड का मैदानी क्षेत्र हर्ष के समय कन्नौज-केंद्रित उत्तर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ गया।
निष्कर्ष
हर्षवर्धन का काल उत्तर भारत के साथ-साथ उत्तराखण्ड के इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। थानेश्वर से कन्नौज तक विस्तारित हर्ष की सत्ता ने उत्तर भारत में एक व्यापक राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया। हर्षचरित और ह्वेनसांग के विवरण से उत्तराखण्ड के साथ हर्षकालीन संपर्क, ब्रह्मपुर की स्थिति तथा बौद्ध धर्म की उपस्थिति की जानकारी मिलती है। विशेष रूप से ब्रह्मपुर में पाँच बौद्ध विहारों का उल्लेख इस क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक स्थिति पर प्रकाश डालता है। इस प्रकार हर्षकाल उत्तराखण्ड के मैदानी और हिमालयी क्षेत्रों को व्यापक उत्तर भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण चरण था।