परवर्ती कुणिन्द मुद्राये |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुणिन्दों की परवर्ती मुद्राएँ उनके इतिहास एवं सभ्यता के अध्ययन का महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्रोत हैं। इन मुद्राओं से तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। इन पर शासकों के नाम, विभिन्न लेख तथा अनेक प्रतीकों का अंकन मिलता है। इनके निर्माण में ताम्र एवं रजत धातु तथा ब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपि का प्रयोग हुआ। परवर्ती कुणिन्द मुद्राओं में कला एवं प्रतीकात्मकता की विविधता भी दिखाई देती है। विशेष रूप से अमोघभूति की मुद्राएँ कुणिन्दों की विकसित मुद्रा-परंपरा और समृद्धि का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
परवर्ती कुणिन्द मुद्राएँ की विशेषताये
- परवर्ती कुणिन्द मुद्राएँ खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं।
- ये रजत एवं ताम्र धातुओं द्वारा निर्मित किये गये हैं।
- अधिकांश मुद्राओं में इनका प्रचलन करने वाले शासक का नाम उत्कीर्ण है।
- अमोघभूति द्वारा प्रचलित मुद्राएँ कला की दृष्टि से उच्च स्तरीय हैं तथा तत्कालीन आर्थिक स्थिति को भी दर्शाती हैं। मुद्राएँ कुणिन्द शासन के चरमोत्कर्ष को भी प्रदर्शित करते हैं।
- अमोघभूति के पश्चात् के शासकों द्वारा जारी की गयी मुद्राएँ ताम्र धातु से निर्मित तथा कला की दृष्टि से निम्न स्तरीय हैं।
परवर्ती कुणिन्द मुद्राओं के प्रकार
परवर्ती कुणिन्द मुद्राओं को तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है।
- अमोघभूति प्रकार
- अल्मोड़ा प्रकार
- छत्रेश्वर प्रकार
1. अमोघभूति प्रकार
- अमोघभूति प्रकार की मुद्राएँ कुणिन्द शासक अमोघभूति ने जारी की।
- ये मुद्राएँ रजत एवं ताम्र धातुओं से निर्मित हैं।(दो लिपि/द्विलिपीय मुद्रा)
- इनमें खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपियों का प्रयोग किया गया है।(द्विधात्विक)
- इस प्रकार की मुद्राओं में “रज कुणिन्दस अमोघभूतिस महारजस” लेख उत्कीर्ण है।(लिपि – ब्राह्मी, भाषा – प्राकृत)
- इस प्रकार की मुद्राओं को एलन ने द क्वाइन्स ऑफ एन्शिएंट इंडिया में यूनानी शासकों द्वारा प्रचलित की गयी हेमीदृष्टय मुद्राओं के समान माना है।
- अमोघभूति प्रकार की रजत मुद्राएँ 31 से 38 ग्रेन वजन तक की हैं तथा ताम्र मुद्राएँ 9.5 ग्रेन से 252 ग्रेन तक वजन की हैं।
- अमोघभूति मुद्राओं में नारी, मृग, स्वास्तिक, बौद्ध वेष्ठनी, चक्र, नाग, चैत्य, वेदिका, नन्दी तथा लहरदार रेखाओं को अंकित किया गया है।
- इन मुद्राओं में यूनानी प्रभाव भी दृष्टिगत होता है।
- अमोभूति की मुद्रा तीनों मुद्रा में सर्व प्राचीन मानी जाती है।इसके अग्रभाग में एक द्विहस्ता देवी और उसकी दहनी ओर उसे देखता हुआ मृग हैं।
- अमोघभूति ही एकमात्र ऐसा परवर्ती कुनिंद शासक था जिसको मुद्राओं में उसकी उपाधि ‘महाराज’ उत्कीर्ण है।
- कुणिन्द के तृतीय काल में सर्वाधिक मुद्राएं अमोघभूति की ही मिली है।
2. अल्मोड़ा प्रकार
- अल्मोड़ा प्रकार की अधिकांश मुद्रायें अल्मोड़ा जिले से प्राप्त हुई हैं।
- अल्मोड़ा प्रकार की मुद्राएँ प्रमुखतया ताम्र धातु से निर्मित की गयी हैं।
- ये मुद्राएँ 119 ग्रेन से 327 ग्रेन वजन तक की हैं।
- अल्मोड़ा मुद्राओ मे आठ राजाओं की जानकारी मिलती है।अल्मोड़ा प्रकार की मुद्रायें म-ग-भ-त-स, शिवदत्त, शिवपालित, हरदत्त इत्यादि कुणिन्द शासकों द्वारा उत्कीर्ण की गयी हैं।
- ये मुद्रायें ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं।
- इन मुद्राओं में वृत्त, कुबड़ा बैल, वेदी, छत्र, लम्बवत् रेखायें, नन्दीपाद, नाग, मानव मूर्ति इत्यादि का अंकन किया गया है।
3. छत्रेश्वर प्रकार
- छत्रेश्वर प्रकार की मुद्राओं में “भगवत चतरेश्वर महात्मनः” उत्कीर्ण किया है।
- ये मुद्राएँ 131 ग्रेन से 291 ग्रेन वजन तक की हैं।
- इन मुद्राओं पर कुषाण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
- इन मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव, त्रिशूल दाहिने हाथ में धारण किया गया है, परशु, बायाँ हाथ कमर पर रखा हुआ उत्कीर्ण है। इसके अतिरिक्त मृग, वृक्ष, चैत्य, त्रिभुजाकार चिन्ह, इत्यादि का अंकन मिलता है।
- इन मुद्राओं में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
- इन मुद्राओ को स्थानक शिव प्रकार की मुद्रा भी कहा जाता है।
अतिरिक्त प्राप्त मुद्राए
उपरोक्त प्रमुख प्रकारों के अतिरिक्त अन्य प्रकार की मुद्रायें भी प्राप्त हुई हैं जो कि देहरादून, बेहट तथा भैड़ागाँव से प्राप्त हुई हैं। इन मुद्राओं में भानु एवं रावण का नाम उत्कीर्ण किया गया है। कई ऐसी मुद्रायें भी प्राप्त हुई हैं जिस पर कोई नाम उत्कीर्ण नहीं है। ये मुद्रायें ताम्र धातु से निर्मित हैं तथा इनमें ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है। मुद्राएँ घिसी हुई तथा भद्दी भी हैं। इन मुद्राओं पर कुषाण प्रभाव भी दृष्टिगत होता है। मुद्राओं में खड़े मुद्रा में कार्तिकेय बायाँ हाथ कमर में रखे हैं। त्रिशूलधारी शिव, ध्वज, बिन्दुओं से निर्मित परिधि, देवी, चैत्य, मृग, नाग इत्यादि का अंकन मिलता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार परवर्ती कुणिन्द मुद्राएँ कुणिन्दों के राजनीतिक उत्कर्ष, आर्थिक गतिविधियों, धार्मिक विश्वासों तथा सांस्कृतिक संपर्कों को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती हैं। शासकों के नाम एवं उपाधियों से इनके राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता मिलती है, जबकि ताम्र एवं रजत मुद्राएँ तत्कालीन मुद्रा-प्रचलन एवं आर्थिक स्थिति की जानकारी देती हैं। अमोघभूति की उत्कृष्ट मुद्राएँ कुणिन्द शक्ति के चरमोत्कर्ष और विकसित कला का परिचय कराती हैं। वहीं शिव, कार्तिकेय, नन्दीपाद, चैत्य, बोधिवृक्ष आदि प्रतीक धार्मिक विविधता को स्पष्ट करते हैं। यवन एवं कुषाण प्रभाव कुणिन्दों के व्यापक सांस्कृतिक संपर्कों को दर्शाता है। अतः परवर्ती कुणिन्द मुद्राएँ उनके इतिहास की बहुआयामी एवं महत्वपूर्ण प्रमाणिक सामग्री हैं।