कुणिन्दों का शासनकाल|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुणिन्दों का शासनकाल उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। उपलब्ध साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर उत्तराखण्ड में कुणिन्दों के अस्तित्व का आरम्भ महाभारत काल, सम्भवतः 1000–900 ई.पू. से माना जाता है, जबकि उनका अस्तित्व दूसरी–तीसरी शताब्दी ई. तक ज्ञात होता है। उनके राजनीतिक विकास को सामान्यतः तीन कालों में विभाजित किया जाता है—प्रथम काल महाभारत काल से 5वीं–6वीं सदी ई.पू. तक, द्वितीय काल 5वीं–6वीं सदी ई.पू. से दूसरी–तीसरी सदी ई.पू. तक तथा तृतीय एवं अंतिम काल दूसरी–तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी–तीसरी सदी ई. तक। इन कालखंडों में कुणिन्दों की राजनीतिक स्थिति, स्वतंत्रता, क्षेत्रीय प्रभाव तथा राजधानियों में परिवर्तन दिखाई देता है।
कुणिन्दों का शासनकाल
कुणिन्दों का उत्तराखंड की भूमि में अस्तित्व महाभारत काल के प्रारंभ (संभवतः 1000 ईसा पूर्व 900 ईसा पूर्व )से दूसरी तीसरी शताब्दी तक ज्ञात होता है।कुणिन्दों के शासन काल को तीन कालक्रमों में विभाजित किया जा सकता है—
- प्रथम काल — महाभारत काल से 5वीं-6वीं सदी ई.पू. तक।
- द्वितीय काल — 5वीं-6वीं सदी ई.पू. से दूसरी-तीसरी सदी ई.पू. तक।
- तृतीय एवं अन्तिम काल — दूसरी-तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी-तीसरी सदी ई. तक।
प्रथम काल
प्रथम काल महाभारत काल से 5वीं-6वीं ई. पू. तक माना जा सकता है। इस काल के सम्बन्ध में महाभारत से पर्याप्त सूचनायें प्राप्त होती हैं। महाभारत में सुबाहु नामक जिस शक्तिशाली शासक का उल्लेख मिलता है वह कुणिन्द जाति से ही सम्बन्धित था। सुबाहु ने पाण्डवों के पक्ष में महाभारत युद्ध में भाग लिया था। इस काल के प्रारम्भ में कुणिन्द जनपद एक स्वतन्त्र जनपद था। बाद में उसने पाण्डवों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था।
द्वितीय काल
द्वितीय काल 5-6 ई. पू. से दूसरी-तीसरी सदी ई. पू. तक के समय को माना जा सकता है। यह समस्त उत्तर भारत के लिये एक संक्रमण काल था। इस काल में धार्मिक क्षेत्र में महान क्रान्तियाँ हुई। परिणाम स्वरूप महावीर तथा बुद्ध जैसे धर्मों द्वारा जैन एवं बौद्ध धर्म जैसे विचार प्रधान धर्मों की स्थापना की गयी। इस काल में कुणिन्द जनपद अपने अस्तित्व को स्वतन्त्र रखने में सफल रहा। पाणिनि ने इस जनपद का उल्लेख अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ अष्टाध्यायी में किया है। इस समय इस जनपद की राजधानी कालकूट थी।मौर्य तथा शुंग काल भारत के इतिहास के महत्वपूर्ण काल माने जाते हैं। यह वह काल था जब भारत में शासन के केन्द्रीयकरण का प्रयास किया गया। इस केन्द्रीयकरण का प्रभाव कुणिन्द जनपद में भी सम्भवत: पड़ा होगा। इस काल में कुणिन्द जनपद के किसी भी शासक का नाम ज्ञात नहीं हुआ है और न कोई मुद्रा ही इस ओर संकेत करती है।
तृतीय काल
कुणिन्द जनपद का तीसरा एवं अन्तिम काल दूसरी एवं तीसरी सदी ई. पू. से दूसरी-तीसरी सदी ई. तक माना जा सकता है। इस काल को कुणिन्दों के चरमोत्कर्ष का काल माना जा सकता है। मौर्य एवं शुंग शासन के ह्रास के कारण भारत में केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति नष्ट प्राय हो गयी थी। विकेन्द्रीकरण का प्रारम्भ हो गया था। सम्भवत: इसी विकेन्द्रीकरण का प्रभाव था कि कुणिन्द जनपद अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ चला।इस काल में कुणिन्द जनपद से सम्बन्धित कई अभिलेख तथा मुद्रायें प्राप्त हुई हैं। कुणिन्द शासकों द्वारा मुद्रायें जारी करना दर्शाता है कि वे स्वतन्त्र एवं शक्तिशाली थे। इस काल में कुणिन्द जनपद की राजधानी स्त्रुघ्न नगर थी जो कालान्तर में बेहट या अन्यत्र स्थानान्तरित हो गयी थी। बेहट से प्राप्त मुद्राओं के आधार पर ऐसा समझा जाता है।
कुणिन्दों की राजधानी का क्रम
कुणिन्दों के राज्य का मुख्यालय अथवा राजधानी समय-समय पर परिवर्तित होती रही। उपलब्ध साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर उनकी राजधानियों का क्रम निम्न प्रकार माना जाता है—
- श्रीनगर — प्रथम काल (सुबाहु काल): प्रारम्भिक काल में कुणिन्दों की राजधानी श्रीनगर मानी जाती है। इस काल का संबंध कुणिन्द शासक सुबाहु से जोड़ा जाता है।
- कालकूट — द्वितीय काल: द्वितीय काल में कुणिन्दों की राजधानी कालकूट थी। पाणिनी की अष्टाध्यायी में प्राप्त संदर्भों से इस काल में कुणिन्द जनपद की राजनीतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
- स्त्रुघ्न नगर (सुधनगर) — तृतीय काल: कुणिन्दों के उत्कर्ष काल में राजधानी स्त्रुघ्न नगर (सुधनगर) मानी जाती है। यह इस काल में कुणिन्दों के प्रमुख राजनीतिक केन्द्र के रूप में विकसित हुआ।
- बेहट — तृतीय काल का उत्तरवर्ती चरण: कालान्तर में कुणिन्दों की राजधानी बेहट (सहारनपुर) की ओर स्थानान्तरित हुई मानी जाती है। बेहट से प्राप्त कुणिन्द मुद्राएँ इस क्षेत्र में उनकी राजनीतिक गतिविधियों एवं प्रभाव की पुष्टि करने में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
- राजधानी का क्रम:श्रीनगर → कालकूट → स्त्रुघ्न नगर (सुधनगर) → बेहट
निष्कर्ष
इस प्रकार, कुणिन्दों का इतिहास एक दीर्घकालीन राजनीतिक विकास और उत्थान की प्रक्रिया को दर्शाता है। प्रारम्भिक काल में वे एक स्वतंत्र जनपद के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि बाद के काल में विभिन्न बड़ी राजनीतिक शक्तियों के प्रभाव के बावजूद उन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी। दूसरी–तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी–तीसरी सदी ई. के बीच उनका उत्कर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जब अभिलेखों एवं मुद्राओं से उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता और शक्ति के ठोस प्रमाण मिलते हैं। राजधानियों का श्रीनगर से कालकूट तथा आगे स्त्रुघ्न नगर और बेहट की ओर परिवर्तन उनके बदलते राजनीतिक एवं भौगोलिक प्रभाव-क्षेत्र को दर्शाता है। इस दृष्टि से कुणिन्दों का शासनकाल उत्तराखण्ड में प्राचीन राज्य-व्यवस्था के विकास को समझने में महत्वपूर्ण है।