पौराणिक एवं वैदिक काल मे उत्तराखंड|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
वेदिक एवं पौराणिक काल उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण का महत्वपूर्ण चरण था। इस काल में उत्तराखण्ड को केवल एक पर्वतीय भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि ऋषियों, तपस्वियों, देवस्थलों और पवित्र नदियों की भूमि के रूप में देखा गया। विभिन्न वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, महाकाव्यों तथा पुराणों में इस क्षेत्र के भौगोलिक एवं धार्मिक महत्व का उल्लेख मिलता है। समय के साथ उत्तराखण्ड के विभिन्न भागों के लिए उत्तर-कुरु, केदारखण्ड, मानसखण्ड, ब्रह्मपुर, खसदेश, इलावर्त तथा उत्तराखण्ड जैसे नाम प्रचलित हुए।
महत्वपूर्ण तथ्य
- इस काल के प्रमुख स्रोत पौराणिक ग्रंथ/धार्मिक ग्रन्थ हैं।
- उत्तराखण्ड का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसमें इस क्षेत्र को देवभूमि एवं मनीषयों की पूर्ण भूमि कहा गया है।
- ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में उत्तराखण्ड के लिए उत्तर-कुरु का प्रयोग हुआ है जबकि दक्षिण-कुरु मेरठ-हस्तिनापुर के लिए हुआ है।
- कौशीतकी ब्राह्मण ग्रंथ में वाक् देवी का निवास स्थान बद्रीनाथ बताया गया है।
- स्कन्द पुराण में 5 हिमालयी खंडों का वर्णन मिलता है।
- पाँच हिमालयी खंड निम्न प्रकार के हैं— नेपाल, केदारखण्ड, मानसखण्ड, कश्मीर, जालंधर
- स्कन्दपुराण में माया क्षेत्र से श्वेत पर्वत (हिमालय) तक के विस्तृत क्षेत्र को केदारखण्ड जबकि नन्दादेवी पर्वत से कालगिरी तक के क्षेत्र को मानसखण्ड कहा गया।बधाण का नंदा पर्वत इन दोनों खंडो की विभाजन रेखा पर स्थित है।
- केदारखण्ड—गढ़वाल क्षेत्र, मानसखण्ड—कुमाऊँ क्षेत्र, मायाक्षेत्र व गंगाद्वार—हरिद्वार।
- पुराणों में केदारखण्ड व मानसखण्ड के संयुक्त क्षेत्र को ब्रह्मपुर, खसदेश, इलावर्त व उत्तर-खण्ड कहा गया
- बौद्ध साहित्य की पालिभाषा में उत्तराखण्ड के लिए हिमवंत शब्द का प्रयोग किया गया।
- ऋग्वेद में आर्य लोग पाँच जातियों में विभक्त थे— पुरु, त्रित्सु, अनु, यदु एवं त्रिवसु । वैदिक काल में उत्तराखण्ड में त्रित्सु जन का शासन था।
- स्वयंभू महाकाव्य में गढ़वाल हिमालय के लिए गौरी-गुरु शब्द का प्रयोग हुआ है।
- रामायण कालीन लक्ष्मण के पुत्र अंगद एवं चन्द्रकेतु का राज्य हिमालय क्षेत्र में स्थित था। यहीं से हनुमान जी ने द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लंका ले जाकर लक्ष्मणजी को जीवनदान दिया था।
निष्कर्ष
वेदिक एवं पौराणिक साहित्य में उत्तराखण्ड के उल्लेख से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय परंपरा में इस क्षेत्र का भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व अत्यंत व्यापक था। ऋग्वेद से लेकर ब्राह्मण ग्रंथों, रामायण तथा पुराणों तक इसके विभिन्न नामों, क्षेत्रों, पर्वतों और तीर्थस्थलों का वर्णन मिलता है। केदारखण्ड और मानसखण्ड की अवधारणा ने आगे चलकर उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय एवं धार्मिक पहचान को मजबूत आधार प्रदान किया। अतः वेदिक एवं पौराणिक साहित्य उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास, उसकी सांस्कृतिक परंपराओं और ‘देवभूमि’ की ऐतिहासिक अवधारणा को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है