गढ़वाल भ्रातृ मंडल
परिचय
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में उत्तराखण्ड के लोगों में सामाजिक जागरूकता और संगठनात्मक चेतना का विकास हो रहा था। शिक्षा, सामाजिक सुधार, क्षेत्रीय समस्याओं तथा प्रवासी गढ़वालियों के हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए विभिन्न संस्थाओं का गठन किया गया। इन संस्थाओं ने लोगों को एक मंच पर लाने और सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गढ़वाल भ्रातृ मंडल भी ऐसी ही एक संस्था थी, जिसने गढ़वाल के लोगों को संगठित करने तथा उनके हितों से संबंधित विषयों को सामने लाने का प्रयास किया।
प्रमुख तथ्य
- गढ़वाल भ्रातृ मंडल की स्थापना 1907 ई. में लखनऊ में मथुरा प्रसाद नैथानी एवं उनके सहयोगियों द्वारा की गई थी।
- गढ़वाल भ्रातृ मंडल का प्रथम अधिवेशन 1908 ई. में कोटद्वार में आयोजित हुआ।
- इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता कुलानंद बर्थवाल ने की थी।
- गढ़वाल भ्रातृ मंडल का छठा अधिवेशन 1913 ई. में आयोजित किया गया।
- 1913 के अधिवेशन में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
- गढ़वाल क्षेत्र की विभिन्न सभाओं को एकजुट करके ‘गढ़वाल सभा’ बनाने का विचार सामने आया।
- विशंभर दत्त चंदोला ने विभिन्न सभाओं के विलय से गढ़वाल सभा बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया।
- इस उद्देश्य से विभिन्न सभाओं के विलय की संभावनाओं पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की गई।
निष्कर्ष
गढ़वाल भ्रातृ मंडल ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गढ़वाल के लोगों को संगठित करने और उनके सामाजिक एवं क्षेत्रीय हितों को सामने लाने में भूमिका निभाई। इसके अधिवेशनों में स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ हो रहे व्यवहार जैसे व्यापक विषयों पर भी विचार किया गया। विभिन्न गढ़वाली सभाओं को मिलाकर गढ़वाल सभा बनाने का प्रस्ताव क्षेत्रीय संगठनों के बीच एकता स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास था। इस प्रकार गढ़वाल भ्रातृ मंडल उत्तराखण्ड में संगठनात्मक चेतना और सामाजिक जागरूकता के विकास से जुड़ी एक उल्लेखनीय संस्था थी।